ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती जा रही है। जिसका असर बर्फ के साथ साथ जलवायू और पर्यावरण पर पड़ रहा है। बेमौसम बारिश का होना और लगातार बारिश से बाढ़ का आना इसके संकेत है। इसी तरह से दुनिया के सबसे बर्फिले इलाके आर्कटिक में ग्लोबल वार्मिंग का असर देखने को मिल रहा है। यहा बर्फ हर से ज्यादा तेजी से पिघल रही है।


वैज्ञानिकों ने इसे आर्कटिक के हिस्से को "लास्ट आइस एरिया" का नाम दिया गया है, क्योंकि वहां तैरती समुद्री बर्फ आमतौर पर इतनी मोटी होती है कि इसके दशकों तक ग्लोबल वार्मिंग का सामना करने की संभावना होती थी। इसलिए, वैज्ञानिक पिछली गर्मियों में चौंक गए, जब एक जहाज के गुजरने के लिए अचानक पर्याप्त पानी पाया गया है।


जर्मन के वैज्ञानिकों ने खुलासा किया कि एक अजीब मौसम की घटना के कारण था, लेकिन दशकों के जलवायु परिवर्तन से समुद्री बर्फ का पतला होना एक महत्वपूर्ण कारक था। मध्य शताब्दी तक अधिकांश आर्कटिक गर्मियों में समुद्री बर्फ पिघल सकती है।


टोरंटो विश्वविद्यालय के वायुमंडलीय भौतिक विज्ञानी ने कहा, 1 मिलियन वर्ग किलोमीटर क्षेत्र गर्मियों में लगभग 2100 तक बर्फ से मुक्त नहीं होगा। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के समुद्र विज्ञानी सह-लेखक माइक स्टील ने कहा कि " हमने सोचा कि यह एक तरह से स्थिर था। यह बहुत चौंकाने वाला है। 2020 में, यह क्षेत्र अचानक से पिघल गया।"