त्रिपुरा का बरमुरा पहाड़ी गांवों के लोग होन्र्बिल पक्षियों की देखभाल अपने बच्चों की तरह करते हैं। बरमुरा पहाड़ी रेंज त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से करीब 60 किलोमीटर दूर पूर्व में स्थित है। इस गांव के अलावा बरमुरा हिल रेंज के अन्य गांव खोईबारी, होदराई और नारायनबारी भी होन्र्बिल पक्षियों का सरंक्षण करते हैं। गांवों में होन्र्बिल पक्षी की मौजूदगी शांति और सद्भाव का प्रतीक माना जाता हैं।


त्रिपुरा में होन्र्बिल प्रजाति के लगभग 300 पक्षी हैं और 60 पेड़ हैं जहां इन पक्षियों के घोंसले हैं। होन्र्बिल पक्षी 80-90 फिट की ऊचाई पर पेड़ के खोखले तना में एक बिल बनाता और एक बार अंडा देने पर मादा होन्र्बिल तीन महीने के इसी बिल में रहती हैं। वही नर होन्र्बिल पक्षी बिल के पास ही कीचड़ से एक बिलनुमा घोसला बना कर बाहर रहता और तीन महीने के लिए अपने जोड़ीदार मादा को भोजन खिलाता हैं। नर होन्र्बिल अपनी मादा जीवन साथी को नहीं छोड़ता हैं। आदिवासी समाज में लोग पति-पत्नी एक दूसरे का साथ न छोडऩे और एक-दूसरे के प्रति वफादार होने के लिए होन्र्बिल पक्षी के जोड़े का उदाहरण देते हैं।


बरमुरा गांव के निवासी जॉय माणिक रूपिनि कहते हैं कि 'मैं 82 साल का हूं ... होन्र्बिल पक्षियों को अपने बच्चों की तरह पालते हुये बड़ा हुआ हूं...कोई कैसे अपने बच्चों को मारने की सोच सकता हैं जो आपके परिवार के हैं... हमारे लिए होन्र्बिल पक्षी परिवार के सदस्य की तरह हैं। बरमुरा पहाड़ी रेंज पादप और जन्तु की विविधता के लिए जानी जाती हैं। लेकिन हाल ही के वर्षों में बड़े पेड़ कट जाने से इन दुर्लभ पक्षियों के लिए बड़ा ख़तरा पैदा हो गया हैं। इस स्थिति को जानने के बाद बरमुरा गांव के लोगों ने केला और पपीता के पौधे लगाने शुरू किये ताकि इन पक्षियों को घोसला बनाने के लिए पर्याप्त जगह मिल सके। होन्र्बिल पक्षी के मरने पर गांवों के लोग शोक मनाते हैं। रिवाज़ में पपीता और केला रखकर होन्र्बिल पक्षियों के आने का इंतजार करते हैं।