वर्ष 1999 मेरी जिंदगी का सबसे अहम साल रहा। उस दिन शाम ढल रही थी। मैं सिलीगुड़ी सिकना में पदस्थ था। इंजीनियरिंग सेवा बटालियन को सूचना मिली कि लेह क्षेत्र में तैनाती की गई है, तत्काल रवाना हुए। कारगिल पहाड़ियों में 6454 पोस्ट पर तैनाती की गई। पहाड़ियों की ऊंचाइयां दिल दहला देने वाली थीं। ऐसी ही पहाड़ियों में फुटपाथ, पगडंडियां और रास्ते बनाए। 

उन्होंने कहा लगभग एक माह में रात और दिन का पता नहीं चला। सूचना मिलते ही हमारी बटालियन में शामिल एक अधिकारी और नौ साथी पूरी तरह जुट गए। पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था। गोलीबारियों के बीच जान जोखिम में थी। लगातार विषम परिस्थितियों में सिर्फ इस देश की धरती को बचाने और सीना तानकर दुश्मनों को जवाब देने का मकसद था।

ये कहना है 61 वर्षीय सेवानिवृत्त कैप्टन वली मोहम्मद का। उन्होंने बताया कि उस दौरान बच्चे छोटे थे। दो बेटे और एक बेटी। पत्नी सकीना से मिले एक साल हो गया था। उस वक्त मेरे पिता मोहम्मद नासीर व मां रुकैया उम्रदराज हो रहे थे।

उनका कहना है कि जब आखिरी बार एक साल पहले रवाना हुआ तो सेहत का ध्यान रखने और देश के लिए कुछ भी कर गुजरने की नसीहत दी थी। वह कठिन वक्त भी बीता। मन रोमांचित रहा हमेशा, परंतु उस वक्त हमारे कई साथी शहीद हो गए। इन दिनों कैप्टन रैंक से सेवानिवृत्त जिंदगी बिता रहा हूं। बेटी की शादी हो गई। दोनों बेटे सेना में जाना चाहते थे, परंतु मेडिकल फिटनेस नहीं बन पाई।

उनके अनुसार मुझे लगता है काश, मेरे साथियों की जगह मैं शहीद हो जाता। अभी भी समाचारों में पाकिस्तान की कायराना हरकत को देखता हूं तो यहीं कहूंगा कि पाकिस्तान भरोसे लायक नहीं है। सीजफायर में भी फायरिंग करना उसकी पुरानी आदत है। माता-पिता चल बसे हैं। उन्हें सुकून था कि बेटे ने देश सेवा की और अमानत के तौर पर प्रशंसा पत्र लाया है।