त्रिपुरा में चुनावी तारीखों का ऐलान होने के बाद से राजनीतिक मौहाल भी गर्माने लगा है। भाजपा जहां फिर से सत्ता में काबिज़ होने के ख़्वाब देख रही है, तो विपक्षी पार्टियों ने भी ज़ोर लगाना शुरु कर दिया है। ऐसे में सभी राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब जनता को रिझाने-समझाने के लिए राजनीतिक सभाएं और रैलियां कर रहे हैं। लेकिन त्रिपुरा में इस प्रक्रिया में हिंसा का पहलू भी जुड़ गया है।

अभी बीते बुधवार यानी 21 जनवरी को कांग्रेस ने पश्चिम त्रिपुरा के जिरानिया अनुमंडल में एक रैली निकाली। आरोप है कि इस दौरान कुछ भाजपा समर्थकों ने उसका विरोध किया। विरोध इतना ज़्यादा बढ़ गया कि मामला हाथापाई तक पहुंच गया। इस हाथापाई में कांग्रेस के महासचिव अजय कुमार घायल हो गए थे। इसके एक दिन बाद कांग्रेस के एक प्रतिनिधिमंडल ने निर्वाचन आयोग से मुलाकात की, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की मांग की। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कांग्रेस महासचिव कुमारी शैलजा कर रही थीं। जिन्होंने चुनाव आयोग से हमलावरों के ख़िलाफ सख्त कार्रवाई करने की भी मांग की।

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कांग्रेस नेता पर हमला कितना बड़ा था, इसका बात का अंदाज़ा ऐसे लगाया जा सकता है कि कांग्रेस के बाद 16 विधायकों वाली सीपीआई(एम) भी निर्वाचन आयोग के दफ्तर पहुंची। इस प्रतिनिधिमंडल में सीपीआई(एम) के महासचिव सीताराम येचुरी, निलोत्पल बसु और मुरलीधरन शामिल थे। इस प्रतिनिधिमंडल ने विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं और नेताओं के खिलाफ होने वाली हिंसा को लेकर एक ज्ञापन सौंपा।

येचुरी ने चुनाव आयोग को लिखे अपने पत्र में कहा- सीपीआई(एम) सहित विपक्षी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ गंभीर हिंसा की गई है। विडंबना है कि ये घटनाक्रम चुनाव आयोग के प्रतिनिधिमंडल द्वारा राज्य के लोगों को दिए गए ठोस आश्वासन के बावजूद हुई। त्रिपुरा के सीईओ ने विशेष रूप से राज्य में 'जीरो वॉयलेंस मिशन' शुरू किया हुआ है। हालांकि, प्रशासन विशेष रूप से पुलिस प्रशासन पूर्व की तरह ऐसी धमकियों से बेखबर है।

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येचुरी ने कहा कि हिंसा का उद्देश्य स्पष्ट रूप से राज्य में आतंक और भय का माहौल बनाना है, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए माहौल को पूरी तरह से खराब कर देता है। उन्होंने आयोग से मांग करते हुए कहा कि पिछले पांच सालों के दौरान जो हुआ है, उसके विपरीत हम आपसे राज्य विधानसभा के लिए एक स्वतंत्र और निष्पक्ष बैठक आयोजित कर, एक आपातकालीन उपाय निकलने का आग्रह कर रहे हैं। इस ज्ञापन के बाद शनिवार यानी 21 जनवरी को कांग्रेस और वाम दलों ने मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के अगरतला में "लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ताकतों" की एक रैली का आयोजन किया।

खास बात ये रही कि "मेरा वोट, मेरा अधिकार" वाली यह रैली वाम दलों या कांग्रेस के बैनर तले आयोजित नहीं की गई थी। बल्कि इसमें राजनीतिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नागरिकों ने भाग लिया, जिन्होंने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए अपनी मांग व्यक्त की। प्रतिभागियों ने ओल्ड मोटर स्टैंड के माध्यम से रवींद्र भवन से मुख्य निर्वाचन अधिकारी यानी सीईओ कार्यालय तक 3 किमी का मार्च निकाला, इस दौरान राष्ट्रीय ध्वज भी लहराया गया। वाम मोर्चा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने प्रतिभागियों को संबोधित किया।

रैली में चुनाव आयोग पर "हमारा वोट सुनिश्चित करने" और "मतदाताओं पर हमलों की जांच के लिए कदम उठाने" के नारों से खूब गूंजा। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को लेकर दबाव बनाने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल के सीईओ गीते किरण कुमार दिनकर राव से मिलने के बाद रैली का समापन हुआ। कांग्रेस नेता पर हमले के बाद विपक्षियों की एकता रंग भी लाई, क्योंकि आयोग ने दंगा भड़कने की जांच के लिए समय पर उचित कार्रवाई करने में विफल रहने के लिए तीन पुलिस अधिकारियों को दंडित किया।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुदीप रॉय बर्मन ने द टेलीग्राफ को बताया, कि "लोकतंत्र को बचाने, संविधान को बचाने और स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए यह धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकतों की एक जन रैली थी, जिससे त्रिपुरा के लोगों को पिछले पांच सालों में वंचित रखा गया है।" आपको बता दें कि त्रिपुरा में 60 विधानसभा सीटों के लिए 16 फरवरी को वोट डाले जाएंगे, जिसके नतीजे 2 मार्च को आएंगे। वहीं 22 मार्च को त्रिपुरा की मौजूद सरकार का कार्यकाल समाप्त हो रहा है।

इससे पहले साल 2018 के चुनाव में भाजपा और इंडीजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा यानी IPFT ने साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था, जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई थी। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 35 सीटें मिली थीं, सीपीआई(एम) को 16 और IPFT को 8 सीटें मिली थीं। हालांकि इन चुनावों में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुल सका था। आख़िर में सवाल ये उठता है कि राज्य में भाजपा की सरकार है, तो विपक्षियों पर हो रहे लगातार हमलों की ज़िम्मेदारी कौन लेगा।