नई दिल्ली। भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्र कराने के लिए आजाद हिंद फौज खड़ी करने वाले महायोद्धा नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिवस यानि 23 जनवरी को पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है। आपको बता दें कि नेताजी का जीवन जितना अद्भुत शौर्य वाला था उतनी रहस्यमयी उनकी मौत भी है। यह कहा जाता है कि 18 अगस्त, 1945 को ताइपे के लिए उड़ान भरते समय उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। हालांकि, इस बात को सभी लोग स्वीकार नहीं करते। इतना ही नहीं बल्कि आईएनए ने भी उनके निधन पर विश्वास नहीं किया था। आईएनए ने भी कहा है कि नेताजी को अगर अस्पताल ले जाया गया होता तो उनका मृत्यु प्रमाणपत्र या फिर कोई मृत नेताजी की तस्वीर क्यों जारी क्यों नहीं की। 

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नेताजी सुभाष का विमान हादसे का शिकार

बताया जाता है कि मृत्यु से पहले नेताजी कोमा में चले गए थे। जापानी की इंपीरियल सेना के पायलट का भी दावा था कि सरेंडर के बाद नेताजी सुभाष का विमान हादसे का शिकार हो गया था। यह भी बताया गया कि लेफ्टिनेंट जनरल सुनामासा शिदेई और बोस एएसएसआर के प्रतिनिधियों से बात करने के लिए वो डेरेन जा रहे थे। वो चाहते थे कि भारत की आजादी के लिए सरेंडर के बाद भी संघर्ष जारी रहे और सोवियत संघ इसमें साथ दे।

ये है नेताजी के समर्थकों का मानना

दूसरी तरफ नेताजी के समर्थकों का मानना है कि जब बोस के निधन का समय बताया जा रहा है। उस समय कोई विमान हादसा नहीं हुआ था। हालांकि, उनके साथ उड़ान फरने वाले कर्नल हबीब-उर-रहमान ने बाद में जांच आयोग को बताया था। यह भी कहा जाता है कि नेताजी की अस्थियां जापान के रंकोज मंदिर मं रखवाई गई थीं। नेताजी का जीवन असाधारण था। उनकी रणनीति ने ब्रिटिश साम्राज्य को हिला दिया था। नेताजी के निधन के बाद भी उनके जिंदा रहने की कई बातें सामने आती रहीं थीं। हालांकि, कभी भी इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी कि उनकी मौत कैसे हुई थी या फिर वो जिंदा हैं।

ताइहोकू एयरपोर्ट के पास विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था

यह भी कहा जाता है कि नेताजी बंगाल के जंगल में तपस्या करने चले गए थे। यह भी रिपोर्ट्स थीं जिनमें दावा किया गया था कि विमान दुर्घटना में ही उनकी मौत हुई थी। इसके बाद 1946 में फिगेस रिपोर्ट में कहा गया था कि ताइहोकू एयरपोर्ट के पास विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था और सुभाष इसी में सवार थे। इसके बाद पास के ही अस्पताल में उनका निधन हुआ। 1956 में भारत सरकार ने शहनवाज खान की अध्यक्षता में समिति बनाई गई। इस समिति ने 67 गवों के बयान लिए थे। इतना ही नहीं बल्कि उन लोगों के भी बयान लिए गए थे जो कि उस दुर्घटना में बच गए थे। आपको बता दें कि अंतिम समय में बोस का इलाज करने वाले जापान के सर्जन और हबीब भी इसमें शामिल थे।

गवाहों के बयानों में विसंगति

इस समिति का निष्कर्ष ये निकाला था कि 1945 में नेताजी का निधन हो गया था। हालांकि नेताजी के भाई सुरेश चंद्र बोस ने रिपोर्ट पर साइन नहीं किए थे और कहा गया था कि कुछ अहम सबूतों को नजरअंदाज किया गया है। इसके बाद एक और रिपोर्ट आई जिसमें बताया गया था कि अगर गवाहों के बयानों में विसंगति है तो गवाही खारिज कर देनी चाहिए।

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गुमनामी बाबा की भी चर्चा

आपको बता दें कि अयोध्या में रहने वाले गुमनामी बाबा को लेकर भी कई तरह की बातें कही जाती थीं। बताया जाता था कि वो सुभाष चंद्र बोस ही थे। इतना ही नहीं बल्कि उनके बारे में जांच करने के लिए एक कमीशन भी बनाया गया था। 2016 में जस्टिस विष्णु सहाय आयोग बनाया गया था। बताया गया है कि 1985 में गुमनामी बाबा के निधन के बाद उनके कमरे से एक बक्सा मिला था ऐसी चीजें थीं जो कि सुभाष चंद्र बोस से मिलती थीं। गुमनाबी बाबा अंग्रेजी और बंगाली भाषा जानते थे। इतना ही नहीं बल्कि इन भाषाओं की किताबें भी उनके पास से मिली थीं। इस बक्से में से गोल फ्रेम के चश्मे, आजाद हिंद फौज की वर्दी, नेताजी के माता-पिता की तस्वीर समेत कई दस्तावेज भी मिले थे। ऐसे माना गया कि उनका संबंध नेताजी से था।