अब श्रीलंका से भी भारत की टेंशन बढ़ सकती है क्योंकि चीन समर्थन प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे की पार्टी श्रीलंका पीपल्स पार्टी ने आम चुनाव में शानदार जीत दर्ज की है। चुनाव आयोग की ओर से जारी परिणामों के अनुसार 225 सदस्यीय संसद में एसएलपीपी ने अकेले 145 सीटें जीती और सहयोगी दलों के साथ उसने कुल 150 सीटों पर कब्‍जा कर लिया है। इस तरह पार्टी को दो-तिहाई बहुमत मिल गया है। पार्टी को 68 लाख यानी 59.9 प्रतिशत वोट हासिल हुए हैं। इस जोरदार जीत को महिंदा राजपक्षे की देश की राजनीति में वापसी के तौर पर भी देखा जा रहा है।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ऐसे विदेशी नेता थे जिन्‍होंने अपने श्रीलंकाई समकक्ष महिंदा राजपक्षे को उनकी शानदार जीत के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि दोनों पक्ष सभी क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने तथा विशेष संबंधों कोई नई ऊंचाईयों पर ले जाने के लिए काम करेंगे। राजपक्षे ने इसकी जानकारी देते हुए ट्वीट किया, ‘फोन पर बधाई देने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आपका शुक्रिया। श्रीलंका के लोगों के समर्थन के साथ, दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे सहयोग को और आगे बढ़ाने के लिए आपके साथ मिलकर काम करने को उत्साहित हूं। श्रीलंका और भारत अच्छे मित्र और सहयोगी हैं।’ आइए जानते हैं कि चीन समर्थक कहे जाने वाले महिंदा राजपक्षे के वापसी के भारत के लिए क्‍या मायने हैं....
गौरतलब है कि श्रीलंका को चीन के उपन‍िवेश के रूप में बदल दिया था। राजपक्षे के विचार और नीतियों में कोई बदलाव नहीं आया है। वह आगे भी इसे जारी रखना चाहेंगे। हमें अभी चीन को भी देखना होगा। चीन हम पर लगातार हमले कर रहे है। एक तरफ लद्दाख में वह जमीन कब्‍जा करना चाहता है, वहीं ड्रैगन भारत के पड़ोसी देशों नेपाल, बांग्‍लादेश को अपनी तरफ मिला रहा है। नेपाल भारत को आंख दिखाने लगा है। पाकिस्‍तान उसके पक्ष में है बांग्‍लादेश और चीन की दोस्‍ती बढ़ रही है।
राजपक्षे की जीत के बाद अब चीन एक बार फिर से अपनी रणनीति में सफल हो गया है। चीन 10 साल में एक बार फिर से श्रीलंका में मजबूत हो गया है। इसी के साथ चीन की भारत को घेरने की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्‍स की नीति एकबार फिर से मजबूत हो गई है। साथ ही वह अब मलक्‍का से ज‍िबूती के बीच में न्‍यू मेरिटाइम रूट नीति को मजबूत करेगा। यह एक तरह से चीन की भारत के खिलाफ दोहरी दीवार बन गई है।
राजपक्षे ने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान चीन के साथ कई समझौते किए थे जिससे भारत और पश्चिमी देशों की टेंशन बढ़ गई थी। आलोचकों का कहना था कि यह चीन का डेब्‍ट ट्रैप था और राजपक्षे इसमें फंस गए थे। वर्ष 2017 में राजपक्षे ने ही कर्जा नहीं चुका पाने पर रणनीतिक रूप से महत्‍वपूर्ण हंबनटोटा बंदरगाह को 99 साल के लिए चीन को दे दिया था। यह बंदरगाह भारत के बिल्‍कुल पास में स्थित है। राजपक्षे के खिलाफ भ्रष्‍टाचार के कई मामले चल रहे हैं। यह वही राजपक्षे हैं जिन्‍होंने तमिल विद्रोहियों का बहुत क्रूर तरीके से दमन किया था। अब उन्‍हें इस्‍लामिक आतंकवाद का डर सता रहा है। इस शानदार जीत के बाद राजपक्षे और उनका परिवार सत्‍ता पर अपनी पकड़ को और ज्‍यादा मजबूत कर सकता है।