नई दिल्ली। वर्तमान समय में अपने चमत्कारों की वजह से देश विदेश में बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध हो चुके बागेश्वर धाम वाले आचार्य धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री का बड़ा राज सामने आया है। आपको बता दें लोग उनको अब बागेश्वर धाम सरकार के नाम से भी जानते हैं। उनका मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के गढ़ा गांव में हुआ था। इन बाबा के बारे में कई ऐसी बातें हैं जो रहस्यमय हैं। ये बाबा अपनी सिद्धी के दम पर लोगों के मन की बात पढ़कर पर्चा लिखते हैं। लेकिन अब बागेश्वर धाम सरकार ने उनको सिद्धि मिलने की पूरी बात बता दी है। बागेश्वर धाम सरकार बचपन से ही बालाजी के भक्त थे और उनके दादा गुरु की वजह से उन्हें यह सिद्धि मिली है।

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ऐसा था बागेश्वर धाम सरकार का बचपन

बागेश्वर धाम सरकार का कहना है कि उनका बचपन गरीबी में बीता था। उनके पिताजी पंडिताई करते थे और घर में गरीबी थी। उन्होंने कहा कि मैं घर में सबसे बड़ा था त्योहार में छोटे भाई-बहन को नए कपड़े और ठीक से भोजन की व्यवस्था नहीं कर सकता था। उनके दादा जी शुरू से ही बालाजी के भक्त थे। वो बागेश्वर धाम आकर बालाजी की पूजा किया करते थे। लोग कहते थे तुम्हारे दादाजी इतने सिद्ध पुरुष हैं तुम क्यों नहीं हो।

दादा जी धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के गुरू

उनका कहना है दादाजी ही धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के गुरू थे। उनके दादाजी से मिलने लालबत्ती में लोग आते थे। सत्संग करने के लिए बड़े-बड़े लोग आते थे। दादाजी को देखकर मेरा भी मन धर्म और अध्यात्म की तरफ हो गया और दादाजी के सत्संग सुनने लगा। उसके बाद से दादाजी को गुरु बना लिया। बाबा ने बताया कि उनके परिवार में 10 भाई हैं। दादाजी उनको जूठी चाय पिलाते थे।

दादा ने रात को बुलाया था

शास्त्री ने कहा कि एक दिन मैं अपने दादा जी के पास जाकर बोला कि मुझे बताइए कि मेरी गरीबी कब दूर होगी। यह बात सुनकर दादाजी हंसने लगे। उसके बाद उन्होंने मुझे कहा कि तुम रात में आना तुम्हें बताऊंगा। उस समय मेरी उम्र करीब 9 या 10 साल के करीबी थी। बागेश्वर धाम सरकार ने कहा कि दादाजी की बाते सुनकर मैं वापस आया और रात का इंतजार करने लगा।

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रात में मिली सिद्धि

बाबा ने कहा कि जब मैं रात को दादा जी के पास पहुंचा तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और हनुमान जी के सामने खड़ा कर दिया। थोड़ी देर बाद वो हंसे और बोले अब जाओ। उन्होंने मुझे कुछ भी नहीं बताया। लेकिन धीरे-धीरे मुझे अजीब सी चीजों का आभास होने लगा था। कोई मेरे सामने आता तो मैं उसका नाम जान जाता था लेकिन कहने में संकोच लगता। जब वो अपना नाम बताता तो मैं खुद से कहता कि ये तो मुझे पता था मैंने पहले क्यों नहीं बताया।

दादाजी ये थी सलाह

धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री ने ये बात अपने दादाजी को बताई कि मैं लोगों के बिना कहे ही उनका नाम जान लेता हूं, लेकिन बताने में संकोच होता है। उसके बाद दादाजी ने मुझे हनुमान चालीसा पढ़ने की सलाह दी। उसके बाद मैंने हनुमान चालीसा पढ़ना शुरू किया। काफी ज्यादा तपस्या की और हवन किये। ये सब होने के बाद मेरा मन घर में कम लगता था मैं बालाजी की सेवा में अपना जीवन व्यतीत करने लगा। बाबा ने कहा कि वो कोई चमत्कार नहीं करते हैं बल्कि वेदों और ग्रंथों में जो लिखा है उसी के जरिए लोगों के मन की बात को समझ लेते हैं।