देवघाटी में कई जल स्रोत हैं जिनका इतिहास किसी न किसी से जुड़ा हुआ है। मणिकर्ण घाटी में भी एक ऐसा झरना है जिसका नाम फुहाल है। फुहाल शिल्हा गांव से ऊपर जंगल में काफी ऊंचाई पर है। इसकी कथा भी काफी रोचक है।

लोगों का एेसा मानना है कि जंगल में एक फुहाल अक्सर भेड़-बकरियों को चराने के लिए आता था। इस जंगल में पानी का कोई भी स्रोत नहीं था इसलिए वह पीने के लिए पानी अपने साथ ही किसी बर्तन में भरकर ले जाता था। एक दिन वह अपने साथ पानी ले जाना भूल गया। दिन में जब उसे प्यास लगी तो पानी न मिलने की वजह से वह काफी परेशान हो गया। उसने पूरा जंगल घूमा लेकिन उसे पानी नहीं मिला। घर तो शाम ढलने के बाद ही जाना था।


फुहाल अपने साथ एक पारंपरिक दराट रखता था। दिनभर भेड़-बकरियों के पीछे चलते-चलते फुआल को अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी नहीं मिला तो थक कर वह एक चट्टान के पास आकर बैठ गया। प्यासे फुआल को अपने आप पर काफी गुस्सा आ रहा था कि आज उसकी मति मारी गई थी जो अपने साथ पानी नहीं लाया। उसने गुस्से में अपना दराट उठाया और इस चट्टान पर दे मारा। दराट की चोट से चट्टान में एक छेद हो गया और उससे पानी का फव्वारा फूट पड़ा। फुहाल की खुशी का ठिकाना न रहा और उसने पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई। लोगों की मान्यता है कि तब से इस जगह नाम फुआल पाणी रखा गया है।

रहस्य आज भी बरकरार

शिल्हा गांव के साथ लगती पहाड़ी पर चट्टान के भीतर से पानी निकलना किसी रहस्य से कम नहीं है। इस पानी को देखने के लिए कई लोग यहां आते हैं। स्थानीय गडरिये का कहना है कि पानी किस तरह चट्टान से निकल रहा है और कहां इसका मूल स्रोत है, यह हरेक के लिए रहस्य बना हुआ है। कई लोग तो यहां पर धूप बत्ती भी करते हैं और साक्षात ईश्वर को अपने करीब पाते हैं।