एक महिला ने पूरे गांव को बना दिया रोल मॉडल, बदल दी 600 घरों की तकदीर

Daily news network Posted: 2019-08-18 18:11:51 IST Updated: 2019-08-18 18:11:51 IST
एक महिला ने पूरे गांव को बना दिया रोल मॉडल, बदल दी 600 घरों की तकदीर
  • मोनिशा बहल ने पूर्वोत्तर के गांव चिजामी की महिलाओं को सक्षम बनाते हुए पूरे गांव की तस्वीर व तकदीर बदल दी।

कोहिमा

कहते हैं कि नारी शक्ति अगर ठान ले तो किसी भी किस्मत बदल सकती है। ऐसा ही वाकया पूर्वोत्तर के छोटे से गांव चिजामी में देखने को मिला है। यह गावं बरसों तक लोगों के लिए अनजान रहा, लेकिन अब विश्व स्तर पर इसकी चर्चा होती है। क्योंकि यहां की महिलाओं ने ऐसा कर दिखाया जो सबके लिए आदर्श बनकर सामने आया है। करीब 600 घरों और 3000 की आबादी वाला यह छोटा सा गांव अब लोगों के लिए रोल मॉडल बन चुका है। क्योंकि यहां के विकास के मॉडल ने लोगों का ध्यान खींचा है जिस वजह से यहां अब सालभर लोगों का आना-जाना लगा रहता है और वो कुछ न कुछ सीख लेकर जाते हैं। इस गांव की तकदीर बदली है मोनिशा बहल ने। इन्होंने गांव की महिलाओं को साथ लेकर विकास की नई इबारत लिखी है। आर्थिक रूप से हाशिए पर खड़ी यहां की महिलाओं ने डॉ. बहल के नेतृत्व में गांव के परिवर्तन में अपना दिल, खून और पसीना एक साथ डाला और खुद को सक्षम बनाया। यहां की पारंपरिक बुनाई को सहारा बना बहल ने महिला अधिकारों की आवाज बुलंद की और एक बेहतर भविष्य का सपना बुना। महिला अधिकार कार्यकर्ता और नॉर्थ ईस्ट नेटवर्क ( NEN ) की संस्थापक मोनिशा बहल नगालैंड में महिला स्वास्थ्य मानकों में सुधार के उद्देश्य से यहां आई थीं।

 

डॉ. बहल ने नगा समाज में महिलाओं की सामूहिक ताकत को देखते हुए राज्य में व्याप्त विक्षिप्त स्वास्थ्य और स्वच्छता पर्यावरण के बारे में कुछ करने के लिए इसका उपयोग करने का निर्णय लिया। बहल की मुलाकात यहां पर सेनो त्साह से हुई। सेनो चिजामी वुमंस सोसायटी की प्रतिनिधि थीं और उन्होंने चिजामी के पास सुमी गांव में अध्यापन का काम किया था। इसके बाद उन्होंने शुरुआत में स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण में सुधार पर ध्यान केंद्रित किया। इसके बाद बांस शिल्प, खाद्य प्रसंस्करण, जैविक खेती, छत पर जल संचयन और कम लागत वाली स्वच्छता जैसे कौशल संवर्धन कार्यक्रम शुरू किए। इसके अलावा शासन, महिला सशक्तीकरण और मानवाधिकार जैसे विषयों पर भी सेमिनार आयोजित किए।

 

बहल की एक ऐतिहासिक उपलब्धि यह थी कि आठ साल के संघर्ष के बाद गांव की महिलाओं को आखिरकार 2014 में ग्राम सभा द्वारा अकुशल कृषि श्रम में पुरुषों के समान वेतन दिया गया। उन्होंने महिलाओं के लिए स्थायी आजीविका के अवसर पैदा करने के लिए एक विकेन्द्रीकृत आजीविका परियोजना ‘चिजामी वीव्स’ को हरी झंडी दिखाई और नगालैंड की अनूठी वस्त्र परंपरा को संरक्षित किया। सात बुनकरों के साथ शुरू होने वाले चिजामी वीव्स के पास आज चिज़ामी और फ़ेक जिले के 10 अन्य गांवों में 300 से अधिक महिलाओं का एक मजबूत नेटवर्क है। जिनके द्वारा बनाए गए स्टॉल, कुशन कवर, बेल्ट, बैग, मफलर, कोस्टर, टेबल मैट की नई दिल्ली, कोलकाता, बेंगलुरु और मुंबई में भी धाक है।

 

 

अब महिला बुनकर अपनी बुनाई के माध्यम से अपने परिवारों को सहारा दे रही हैं। वहीं, स्वास्थ्य, आजीविका और पर्यावरण के मुद्दों पर अपनी आवाज उठाकर समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। अब चिजामी में एनइएन संसाधन केंद्र, राज्य में विकास और परिवर्तन का एक केंद्र बन चुका है।