असम की पूर्णिमा पक्षियों के अंडे देने से पहले करती है गोद भराई की रस्म

Daily news network Posted: 2018-03-09 16:36:16 IST Updated: 2018-03-09 16:51:57 IST
असम की पूर्णिमा पक्षियों के अंडे देने से पहले करती है गोद भराई की रस्म
  • असम में रहने वाली पूर्णिमा बर्मन ने दुनिया के सामने एक नर्इ मिसाल पेश की है। इन्होंने न केवल स्टॉर्क प्रजाति के पक्षी को विलुप्त होने से बचाने की दिशा में काम किया बल्कि रीत रिवाजों के माध्यम से लोगों की भ्रांतियों को भी दूर किया।

गुवाहाटी।

असम में रहने वाली पूर्णिमा बर्मन ने दुनिया के सामने एक नर्इ मिसाल पेश की है। इन्होंने न केवल स्टॉर्क प्रजाति के पक्षी को विलुप्त होने से बचाने की दिशा में काम किया बल्कि रीति-रिवाजों के जरिए लोगों की भ्रांतियों को भी दूर किया। यही वजह है कि आज असम के कामरूप जिले में स्टॉर्क की संख्या 50 से 558 हो गई।

 

 


स्टाॅर्क पक्षियों की एक एेसी प्रजाति है, जिसे लोग अपशगुन मानते हैं। असम में स्टाॅर्क समाप्त होने के कगार थे। तभी पूर्णिमा ने इस पक्षी की संख्या को बढ़ाने के लिए दादरा, पचरिया और हिंगीमारी नामक गांव में लोगों को साथ लिया और इनके अंडे देने के समय (नेस्टिंग) को गोद भराई की रस्म से जोड़ा। अब इन तीनों गांव में इनके नेस्टिंग के समय गोद भराई की रस्म धूम धाम से मनाई जाती है। बता दें कि मर्इ 2017 में पूर्णिमा को इस काम के लिए जहां ग्रीन ऑस्कर अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। वहीं आठ मार्च को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद पूर्णिमा बर्मन को नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया।

 

 


विलुप्त होने की कगार पर थे स्टाॅर्क

स्टाॅर्क की प्रजातियां धीरे धीरे समाप्त हो रही है। स्टॉर्क को लोग अपशगुन से जोड़ कर देखते थे आैर यही वजह थी कि जहां भी ये पक्षी घोंसला बनाते थे, गांव के लोग पेड़ ही काट डालते थे। इसी कारण असम में यह विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गए थे। पूर्णिमा ने बताया कि स्टाॅर्क दुर्लभ पक्षियों में से है। अब सिर्फ कंबोडिया, असम के कुछ गांव और बिहार तक सिमट कर रह गए हैं। इसलिए दस साल पहले इस दिशा में काम करना शुरू किया।


 


पूर्णिमा ने बताया कि जब उन्होंने ये काम शुरू किया तो गांव वाले उसे पागल ही समझते थे, लेकिन जब उन्हें इसके महत्व के बारे में पता चला तो साथ देने लगे। 38 साल की पूर्णिमा बताती हैं कि शहरों में से झींगुर, जुगनू, टिड्‌डे जैसे न जाने कितने जीव जंतु वक्त की रफ्तार में पीछे छूटते चले गए, लेकिन इन सबके जाने से पर्यावरण में बढ़ रहे असंतुलन के खतरे से लोग अनजान हैं। इसलिए इन्हें अपने आसपास दोबारा लाने की जरुरत है।