दुनिया के सबसे बड़े मंदिर में छिपे कई गहरे राज, जानकर हैरान हो जाएंगे आप

Daily news network Posted: 2019-12-11 18:26:46 IST Updated: 2019-12-11 18:26:46 IST
दुनिया के सबसे बड़े मंदिर में छिपे कई गहरे राज, जानकर हैरान हो जाएंगे आप
  • हिंदू धर्म भारत का सबसे बड़ा और मूल धार्मिक समूह है। यहां की लगभग 80 फीसदी जनसंख्या हिंदू धर्म को मानती है और यही वजह है कि भारत में अनेक हिंदू मंदिर हैं। शायद ही देश का ऐसा कोई भी शहर या गांव होगा, जहां कोई मंदिर न हो।

दिल्ली।

हिंदू धर्म भारत का सबसे बड़ा और मूल धार्मिक समूह है। यहां की लगभग 80 फीसदी जनसंख्या हिंदू धर्म को मानती है और यही वजह है कि भारत में अनेक हिंदू मंदिर हैं। शायद ही देश का ऐसा कोई भी शहर या गांव होगा, जहां कोई मंदिर न हो। लेकिन इसके बावजूद आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर भारत में नहीं बल्कि कंबोडिया में है।

 


 इस मंदिर का नाम है अंकोरवाट मंदिर। यह मंदिर कंबोडिया के अंकोर में है, जिसका पुराना नाम 'यशोधरपुर' था। इसका निर्माण 12वीं सदी में खामेर वंश के सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय के शासनकाल में हुआ था। खास बात ये है कि यह एक विष्णु मंदिर है जबकि यहां के पूर्ववर्ती शासकों ने प्राय: शिव मंदिरों का ही निर्माण कराया था।

 

 


 402 एकड़ में फैले इस मंदिर की दीवारों पर भारतीय धर्म ग्रंथों के प्रसंगों का चित्रण है। इन प्रसंगों में अप्सराएं बहुत सुंदर चित्रित की गई हैं। इसके अलावा यहां समुद्र मंथन का दृश्य भी दिखाया गया है। विश्व के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक होने के साथ ही यह मंदिर यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों में से एक है। पर्यटक यहां केवल वास्तुशास्त्र का अनुपम सौंदर्य देखने ही नहीं आते बल्कि यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त देखने भी आते हैं।

 

 


 इस मंदिर की खासियत ये है कि इसका मुख्य द्वार पश्चिम दिशा में स्थित है, जबकि सभी प्रमुख हिंदू तीर्थों और मंदिरों के द्वार पूर्व दिशा में होते हैं। सूर्यास्त के समय ऐसा लगता है जैसे यह मंदिर सूर्यदेव को नमन कर रहा हो। ढलते सूरज की रोशनी में इस मंदिर की सुंदरता को देखते बनती है।

 

 


 कहते हैं कि राजा सूर्यवर्मन हिंदू देवी-देवताओं से नजदीकी बढ़ाकर अमर होना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपने लिए एक विशिष्ट पूजा स्थल बनवाया, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की ही पूजा होती थी। आज यही मंदिर अंगकोर वाट के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर के बारे में यह भी कहा जाता है कि स्वयं देवराज इन्द्र ने महल के तौर पर अपने बेटे के लिए इस मंदिर का निर्माण करवाया था।

 


 

 कहते हैं कि राजा सूर्यवर्मन हिंदू देवी-देवताओं से नजदीकी बढ़ाकर अमर होना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपने लिए एक विशिष्ट पूजा स्थल बनवाया, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की ही पूजा होती थी। आज यही मंदिर अंगकोर वाट के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर के बारे में यह भी कहा जाता है कि स्वयं देवराज इन्द्र ने महल के तौर पर अपने बेटे के लिए इस मंदिर का निर्माण करवाया था।

 

 

 


 

 इस मंदिर की रक्षा के लिए एक चतुर्दिक खाई का भी निर्माण कराया गया था, जिसकी चौड़ाई लगभग 700 फुट है। दूर से यह खाई किसी झील की तरह दिखती है। मंदिर के पश्चिम की ओर इस खाई को पार करने के लिए एक पुल बना हुआ है। पुल के पार मंदिर में प्रवेश के लिए एक विशाल द्वार निर्मित है, जो लगभग 1,000 फुट चौड़ा है। मंदिर की दीवारों पर समस्त रामायण मूर्तियों में अंकित है।

 

 


 

 इस मंदिर का इतिहास बौद्ध और हिंदू दोनों ही धर्मों से बहुत निकटता से जुड़ा है। यह मंदिर मूल रूप से हिंदू धर्म से जुड़ा पवित्र स्थल है, जिसे बाद में बौद्ध रूप दे दिया गया, लेकिन आज भी हिंदू और बौद्ध धर्म के अनुयायी समान रूप से इस मंदिर में आस्था रखते हैं।

 

 


 यह मंदिर मेरु पर्वत का भी प्रतीक है। दरअसल, हिंदू धर्म में मेरु पर्वत को भगवान ब्रह्मा सहित अनेक देवताओं का निवास स्थान माना जाता है। चूंकि यह मंदिर कंबोडिया की पहचान रहा है, इसलिए इस मंदिर की तस्वीर कंबोडिया के राष्ट्रीय ध्वज पर भी दिखती है।