रावण की इस तपोस्थली में नहीं होती रामलीला, नहीं जलाए जाते हैं रावन के पुतले

Daily news network Posted: 2019-10-08 17:08:31 IST Updated: 2019-10-08 17:08:31 IST
रावण की इस तपोस्थली में नहीं होती रामलीला, नहीं जलाए जाते हैं रावन के पुतले
  • जहां देश भर में दशहरा पर्व की धूम रहती है। वहीं बैजनाथ में दशहरा मनाना किसी अभिशाप से कम नहीं माना जाता है। भगवान शिव के भक्त रावण की तपोस्थली के रूप में विख्यात बैजनाथ में दशहरा नहीं मनाया जाता है।

जहां देश भर में दशहरा पर्व की धूम रहती है। वहीं बैजनाथ में दशहरा मनाना किसी अभिशाप से कम नहीं माना जाता है। भगवान शिव के भक्त रावण की तपोस्थली के रूप में विख्यात बैजनाथ में दशहरा नहीं मनाया जाता है। वहीं, शिव नगरी भरमौर में रावण के पुतलों का दहन नहीं किया जाता है। रामलीला भी नहीं होती। ऐसा नहीं है कि बैजनाथ में कभी भी दशहरा नहीं मनाया गया। 70 के दशक में बैजनाथ में ऐतिहासिक शिव मंदिर के बाहर स्थित मैदान में दशहरा मनाने का सिलसिला शुरू हुआ था, लेकिन रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले बनाने से लेकर अन्य कार्यों में अहम भूमिका निभाने वाले प्रतिनिधियों के साथ दुर्घटना होने के कारण बाद में लोगों ने दशहरा मनाने का विचार त्याग दिया।

 


 यही नहीं, इस दौरान दो लोगों की मौत भी हो गई। अन्य लोगों के साथ किसी न किसी प्रकार की दुर्घटना पेश आई थी। चार वेदों के ज्ञाता शिव भक्त रावण ने बैजनाथ में ही तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपने दस सिरों को भेंट कर दिया था। बाद में भगवान शिव ने प्रसन्न होकर रावण के सिरों को फिर से जोड़ दिया था। इसके चलते बैजनाथ को बैद्यनाथ के नाम से भी जाना जाता है।

 


 मान्यता है कि मंदिर से आधा किलोमीटर की दूरी पर पपरोला को जाने वाले पैदल रास्ते पर रावण का मंदिर और पैरों के निशान मौजूद हैं। बैजनाथ में एक भी सुनार की दुकान नहीं है, जबकि दो किलोमीटर पर स्थित पपरोला बाजार प्रदेश भर में सोने के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर पुजारी सुरिंद्र आचार्य का कहना है कि रावण शिव का परम भक्त था और भगवान शिव के सामने परम भक्त का पुतला जलाया जाना उन्हें पसंद नहीं है।


 नवरात्र के दौरान भरमौर क्षेत्र में रामलीला मंचन की परंपरा भी नहीं शिव नगरी भरमौर में रामलीला भी नहीं होती। मान्यता है कि रावण भगवान शंकर के परम भक्त थे, जिसने शिव की भक्ति के लिए कैलाश पर्वत पर कड़ा तप किया था। भरमौर में भी पवित्र कैलाश पर्वत स्थित है। ऐसे में भरमौर में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है। जनजातीय क्षेत्र भरमौर को शिव भगवान का निवास स्थान भी माना जाता है। भरमौर के चौरासी परिसर के साथ स्थित अर्द्धगंगा कुंड के साथ ही कपलेश्वर महादेव का मंदिर है।


 उस मंदिर के साथ ही दसमुखी की एक शिला भी है। जिस शिला को रावण के रूप में माना जाता है। इसी के चलते भरमौर में न तो नवरात्रों में रामलीला का मंचन होता है और न ही महानवमी पर रावण का दहन किया जाता है। चौरासी मंदिर में धर्मराज मंदिर के पुजारी पंडित लक्ष्मण दत्त शर्मा ने बताया कि रावण भगवान शंकर का अनन्य भक्त था। ऐसे में शिव स्थली भरमौर में रावण का दहन नहीं किया जाता। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस परंपरा को देखते उन्हें भी पांच दशक हो चुके हैं।