यहां मनाई जाती है अनोखी होली, छह दिन तक चलता है हुल्लड़

Daily news network Posted: 2019-03-21 09:38:12 IST Updated: 2019-03-21 09:41:00 IST
यहां मनाई जाती है अनोखी होली, छह दिन तक चलता है हुल्लड़
  • हाेली की धूम पूरे देश में देखने का मिलती है। होली का नाम जब अाता है तो हमें उत्तर भारत का मथुरा आैर बरसाना जरूर याद आता है। पूरे देश में मथुरा अौर वृंदावन की होली प्रसिद्घ है।

हाेली की धूम पूरे देश में देखने का मिलती है। होली का नाम जब अाता है तो हमें उत्तर भारत का मथुरा आैर बरसाना जरूर याद आता है। पूरे देश में मथुरा अौर वृंदावन की होली प्रसिद्घ है। उत्तर भारत के साथ ही पूर्वोत्तर में भी होली की धूम होती है। होली मनाने की परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन क्‍योंकि भारत विविधताओं का देश है इसलिए भारत में होली को अलग-अलग नामों से पुकारा भी जाता है।

 


 प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर मणिपुर में होली का हुल्लड़ छह दिन तक चलता है। फाल्गुन की पूर्णिमा से शुरू हुई धूम और मस्ती, उड़ते रंग गुलाल और ढोलक की थाप के साथ धुलैंडी तक चलती है, हर कोई इस उत्सव की लय में झूमने लगता है, पूरा माहौल त्योहार की तान पर नाच उठता है।

 हर साल हजारों पर्यटक मणिपुर की होली और यहां के सदियों पुराने त्योहार याओसांग को देखने के लिए आते हैं। हाेली के दिनों में सड़के बिल्कुल खाली होली है, दुकानें और कार्यालय पूरी तरह बंद रहते हैं। मंदिरों में कृष्ण के भजन गूंजते हैं और परंपरागत मणिपुरी वेशभूषा में स्त्री, पुरुष और बच्चे इस उत्सव को मनाने के लिए इकट्ठे होते हैं।

 


 फाल्गुन पूर्णिमा के दिन याओसांग उत्सव पर कई खेल के कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं। इस उत्सव की जान है इस मौके पर किये जाने वाला थबल चैंगबा नृत्य। थबल चैंगबा में लड़के-लड़कियां एक दूसरे का हाथ पकड़कर गाते और नृत्य करते हैं।

 थबल का मतलब है चांदनी, और चैंगबा यानी नृत्य। यहां पूरे छह दिन तक गली-मौहल्लों में गाने बजाने का दौर चलता है। याओसांग पर बच्चे, बड़े-बूढ़े और जवान सभी मिलकर इस उत्सव का मजा उठाते हैं। नाचना, गाना, पीना, खाना करके सब मस्ती में डूब जाते हैं।


 पांच दिन तक चलने वाले इस उत्सव में छोटी लड़कियां सड़क पर चलने वाले हर व्यक्ति से दान मांगती हैं। पहले दिन छोटे लड़के-लड़कियां घर-घर जाकर पैसे मांगते हैं और इसी पैसे को इकट्ठा करके सब मिलकर इस उत्सव को मनाते हैं।


 इस त्योहार को होली के ही साथ मनाने की परंपरा अठारहवीं सदी से शुरू हुई। इस दौरान यहां भगवान श्री कृष्ण और चैतन्य महाप्रभु की पूजा होती है। रंग खेलने वाली होली से एक दिन पहले सूखी टहनियों और घास की झोपड़ी बनाकर पूरा चांद निकलने पर इसे जला दिया जाता है।

 फिर अगले दिन लड़के-लड़कियां टोलियों में जमकर अबीर और गुलाल के साथ होली खेलते हैं। बच्चे पिचकारियों में रंग भरके एक दूसरे को भिगोते हैं और रंगों का जमकर लुत्फ उठाते हैं। भक्तगण पारंपरिक सफेद और पीले रंग की पगड़ियां पहनकर कृष्ण मंदिर में एकत्रित होते हैं।


 इस उत्सव की शुरूआत भजनों से होती है और रंग से तरबतर होने के बाद यह उत्सव पूरे शबाब पर पहुंच जाता है। त्योहार के अंतिम दिन भक्तगण रंगों से सराबोर होकर राजधानी इम्फाल से तीन किलोमीटर दूर पश्चिम की ओर स्थित मुख्य कृष्ण मंदिर तक श्री कृष्ण की सवारी निकालते हैं और यहीं पर राग और रंग का दौर शुरू होता है और ढोलक और दूसरे वाद्ययंत्रों के साथ थबल चैंगबा का रंग जमता है।