सशरीर वैकुंठ जाने का रास्ता है स्वर्गारोहिणी, चारों तरफ है असीम प्राकृतिक सुन्दरता

Daily news network Posted: 2019-10-24 14:46:43 IST Updated: 2019-10-24 16:52:26 IST
सशरीर वैकुंठ जाने का रास्ता है स्वर्गारोहिणी, चारों तरफ है असीम प्राकृतिक सुन्दरता
  • भारत में कई ऐसी खूबसूरत जगहें मौजूद है, जहां की खूबसूरती मन को मोह लेती है। इसी क्रम में आज हम बताने जा रहे हैं स्वर्गारोहिणी के बारे में। स्वर्गारोहिणी बदरीनाथ धाम से नारायण पर्वत पर 30 किमी दूर पर स्थित है। मान्यता है कि ज्येष्ठ पांडव धर्मराज युधिष्ठिर ने स्वान के साथ स्वर्गारोहिणी से ही...

भारत में कई ऐसी खूबसूरत जगहें मौजूद है, जहां की खूबसूरती मन को मोह लेती है। इसी क्रम में आज हम बताने जा रहे हैं स्वर्गारोहिणी के बारे में। स्वर्गारोहिणी बदरीनाथ धाम से नारायण पर्वत पर 30 किमी दूर पर स्थित है। मान्यता है कि ज्येष्ठ पांडव धर्मराज युधिष्ठिर ने स्वान के साथ स्वर्गारोहिणी से ही सशरीर वैकुंठ के लिए प्रस्थान किया था।

 


स्वर्गारोहिणी पहुंचने के लिए भक्तो को बदरीनाथ धाम से नारायण पर्वत पर 30 किमी का पैदल रास्ता तय करना होता है। मार्ग का ज्यादातर हिस्सा हिमखंडों से पटे रहने के कारण इस सफर में तीन दिन लग जाते हैं। स्वर्गारोहिणी के रास्ते में आप असीम प्राकृतिक सुन्दरता को देख सकते हैं। कहीं झरने तो कहीं दूर तक फैले बुग्याल यात्रियों व प्रकृति प्रेमियों को सम्मोहित सा कर देते हैं।

 


चारों ओर बर्फ से ढकी पहाड़ियां मन को असीम शांति प्रदान करती हैं तो वहीं दूर दूर तक फैले हुए रंग-बिरंगे फूल यात्रियों का स्वागत करते हुए नजर आते हैं।पहाड़िया असीम शांति का अहसास कराती हैं। जिधर नजर दौड़ाओ सैकड़ों प्रजाति के रंग-बिरंगे फूल यात्रियों की आगवानी करते नजर आते हैं।

 


पौराणिक कथा के मुताबिक, राजपाट छोड़ने के बाद पांचों भाई पांडव द्रोपदी सहित इसी रास्ते से स्वर्ग गए थे। भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव व द्रोपदी तो स्वर्गारोहिणी पहुंचने से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो गए। लेकिन, धर्मराज युधिष्ठिर ने एक स्वान के साथ पुष्पक विमान से सशरीर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया। इस मान्यता ने स्वर्गारोहिणी का महत्व और बढ़ा दिया।

 


स्वर्गारोहिणी की यात्रा बेहद विकट है। बदरीनाथ धाम से 10 किमी की दूरी पर लक्ष्मी वन, फिर 10 किमी आगे चक्रतीर्थ और उसके बाद छह किमी आगे सतोपंथ पड़ता है। यहां से चार किमी खड़ी चढ़ाई चढ़कर होते हैं स्वर्गारोहिणी के दर्शन। प्राचीन काल में यात्री इन्हीं पड़ावों पर स्थित गुफाओं में रात्रि विश्राम करते थे। परंतु, अब यात्री साथ में टेंट ले जाते हैं।

 


स्वर्गारोहण के दौरान पांडवों ने 14300 फीट की ऊंचाई पर स्थित सतोपंथ झील में स्नान किया था। इसलिए ¨हदू धर्मावलंबियों के लिए इस झील का विशेष महत्व है। मान्यता है कि एकादशी पर स्वयं ब्रह्मा, विष्णु व महेश यहां स्नान करने आते हैं।

 


स्वर्गारोहिणी में तीन किमी व्यास की एक विशाल झील है। यात्री स्वर्गारोहिणी पहुंचकर इस झील की परिक्रमा जरूर करते हैं। मान्यता है कि झील की परिक्रमा करने से उन्हें पुण्य प्राप्त होता है।