वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में बार बार किया जाता है पर्दा

Daily news network Posted: 2019-09-25 14:45:38 IST Updated: 2019-09-25 17:24:58 IST
  • श्री बांके बिहारी का प्रसिद्ध मंदिर वृंदावन में स्थित है। इस मंदिर के बारे कई रोचक बातें हैं जिन्हें जानकार आप भी हैरान रह जाएंगे। उत्तर प्रदेश में मथुरा-वृंदावन को अत्यधिक पवित्र माना जाता है। यहां स्थित रमण रेती में श्री बांके बिहारी का मंदिर है।

श्री बांके बिहारी का प्रसिद्ध मंदिर वृंदावन में स्थित है। इस मंदिर के बारे कई रोचक बातें हैं जिन्हें जानकार आप भी हैरान रह जाएंगे। उत्तर प्रदेश में मथुरा-वृंदावन को अत्यधिक पवित्र माना जाता है। यहां स्थित रमण रेती में श्री बांके बिहारी का मंदिर है। रोजाना इस मंदिर में हजारों की संख्या में भक्त दर्शन के लिए आते है। दरअसल, बांके बिहारी कृष्ण भगवान का ही एक रूप है। रमण रेती में बांके​ बिहारी के मंदिर का निर्माण स्वामी ​हरिदास और उनके वंशजों ने कराया था।


श्री बांके बिहारी जी की मूर्ति के आगे हर दो मिनट के अंतराल पर पर्दा लगाया जाता है। इसके पीछे एक कहानी है। कहा जाता है कि एक बार एक भक्त उनकी छवि को निहारता रहा। उसकी भक्ति के वशीभूत होकर श्रीबांकेबिहारी जी मंदिर से भाग गए।


पुजारी जी ने जब मन्दिर की कपाट खोला तो उन्हें श्रीबांकेबिहारी जी नहीं दिखाई दिए। पता चला कि वे अपने एक भक्त की गवाही देने अलीगढ़ चले गए हैं। तभी से ऐसा नियम बना दिया कि झलक दर्शन में ठाकुर जी का पर्दा खुलता एवं बन्द होता रहेगा। ऐसी ही बहुत सारी कहानियां यहां के बारे में प्रचलित हैं।


एक दिन स्वामी हरिदास को निकुंज वन में बिहारीजी की मूर्ति निकालने का स्वप्नादेश प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्हें निधिवन स्थित विशाखा कुण्ड में श्याम वर्ण छवि वाले श्री का विग्रह मिला। यह मूर्ति श्रीबांकेबिहारी जी के नाम से विख्यात हुई।

 


 बांके बिहारी की मूर्ति मार्गशीर्ष, शुक्ला के पंचमी तिथि को निधिवन स्थित विशाखा कुण्ड से प्रकट हुई थी। बांके बिहारी की प्राकट्य तिथि को विहार पंचमी के रूप में बड़े ही उल्लास के साथ मानया जाता है। इस दिन वृंदावन में कई धार्मिक आयोजन होते है। वर्ष 2017 में जन-जन के आराध्य ठाकुर बांकेबिहारी महाराज का प्राकट्य महोत्सव विहार पंचमी 23 नवंबर को है।


 श्री बांकेबिहारी जी निधिवन में ही बहुत समय तक स्वामी जी द्वारा सेवित होते रहे थे। फिर जब मन्दिर का निर्माण कार्य सम्पन्न हो गया, तब उनको वहां लाकर स्थापित कर दिया गया।



केवल शरद पूर्णिमा के दिन श्रीबांके बिहारी जी वंशीधारण करते हैं। श्रावण मास की तीज के दिन ही श्री बांके बिहारी जी झूले में बैठते हैं। वर्ष में एक ही दिन बिहार पंचमी पर ही चरणामृत के स्थान पर भक्तों को पंचामृत बांटा जाता है। इस मन्दिर में कृष्ण के साथ श्रीराधिका विग्रह की स्थापना नहीं हुई। श्री बांके बिहारी जी की मंगला आरती साल में केवल एक दिन जन्माष्टमी को ही होती है। इस दिन श्री बांके बिहारी जी के दर्शन सौभाग्यशाली को ही हो पाते है। श्री बांके बिहारी जी के चरण दर्शन केवल अक्षय तृतीया के दिन ही होता है। मान्यता है कि इन चरण-कमलों का जो दर्शन करता है उसका तो बेड़ा ही पार लग जाता है।

 


 मंगला आरती नहीं होती

 श्री बांके बिहारी के दर्शन प्रातः 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक एवं सायं 6 बजे से रात्रि 9 बजे तक होते हैं। विशेष तिथि उपलक्ष्यानुसार समय के परिवर्तन कर दिया जाता हैं। यहां पर मंगला आरती नहीं होती। मान्यता है कि ठाकुर जी नित्य-रात्रि में रास में थककर भोर में शयन करते हैं। उस समय इन्हें जगाना उचित नहीं है।