कुंजारानी देवी ने दिलाई महिला वेटलिफ्टिंग में भारत को नई पहचान, मीरा और संजीता चानू मानती हैं IDEAL

Daily news network Posted: 2018-04-07 13:17:12 IST Updated: 2018-04-09 16:20:26 IST
कुंजारानी देवी ने दिलाई महिला वेटलिफ्टिंग में भारत को नई पहचान, मीरा और संजीता चानू मानती हैं IDEAL
  • ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में चल रहे 21वें कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर भारतीय वेटलिफ्टर मीराबाई चानू और संजीता चानू ने देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है

इंफाल

ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में चल रहे 21वें कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर भारतीय वेटलिफ्टर मीराबाई चानू और संजीता चानू ने देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है, हर तरफ मणिपुर की इन दोनों बेटी की तारीफ हो रही है। मीराबाई चानू ने 6 इंटरनेशनल, 3 नेशनल और 3 पर्सनल रिकॉर्ड तोड़कर कॉमनवेल्थ गेम्स का नया रिकॉर्ड बनाया तो वहीं संजीता चानू ने दूसरा गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया है।

 


 ये दोनों ही खिलाडी वेटलिफ्टिंग की आइकन मानी जाने वाली कुंजरानी देवी को अपना आदर्श मानती हैं और यहीं नहीं इन्होने भारत की पहली अंतर्राष्ट्रीय महिला वेटलिफ्टर कुंजारानी देवी को अपना IDEAL मानकर ही वेटलिफ्टिंग शुरू की थी। तो चलिए आज बताते हैं आपको कौन हैं कुंजारानी देवी जिन्होंने वेटलिफ्टिंग में भारत को एक नई पहचान दिलाई ।

 



कौन हैं कुंजारानी देवी


1 मार्च को मणिपुर में जन्मी कुंजरानी देवी का पूरा नाम नामीराक्पम कुंजारानी देवी है, कुंजारानी की खेलों के प्रति रुचि बचपन में ही जागृत हो गई थी जब वह इम्फाल के सिंदम सिंशांग रेजीडेंट हाईस्कूल में 1978 में पढ़ती थीं। उन्होंने, इम्फाल के महाराजा बोधचन्द्र कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरा किया। कुंजारानी देवी ने अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर 60 से अधिक पदक जीत चुकी हैं। 1995 में नौरू में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में वह भारत की प्रथम स्वर्ण पदक विजेता बनी थीं और उन्हें उस वर्ष विश्व रैंकिंग में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था । यद्यपि बाद में वह फिसल कर तीसरे स्थान पर चली गई थीं ।

 



कुंजारानी अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर लगभग 60 से अधिक पदक प्राप्त कर चुकी हैं। वह सेन्ट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स में असिस्टेंट कमांडेंट जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर कार्यरत हैं । उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें 1990 में ‘अर्जुन पुरस्कार’, 1995 में ‘राजीव गांधी खेल रत्न अवार्ड’ तथा 1996 में ‘के.के. बिरला खेल अवार्ड’ प्रदान किया जा चुका है ।

 


 


भारत की पहली अंतर्राष्ट्रीय महिला वेटलिफ्टर


भारत में साल 1935 में वेटलिफ्टिंग खेल के तौर पर शुरू हुआ। मगर महिलाओं को पहली बार वर्ल्ड चैंपियनशिप में हिस्सा लेने का मौका 1989 में मिला था। मणिपुर की एक छोटी सी लड़की थी. कुल 21 साल की उम्र और 4 फुट 8 इंच के कद के साथ देश को नई ऊंचाई पर लेकर जा रही थी । कुंजरानी ने इस चैंपियनशिप में कुल 3 सिल्वर मैडल जीते, इसके बाद लगातार 7 सात साल तक वो वर्ल्ड चैंपियनशिप में हिस्सा लेती रहीं और कोई न कोई मैडल लाती रहीं।

 


 


पी.टी. उषा रही आदर्श

भारत की इस लौह महिला कुंजारानी की आदर्श खिलाड़ी एथलीट पी.टी. उषा रही है । पी.टी. उषा ने अन्तरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अनेकों पदक जीते, कुंजारानी उसी से प्रभावित रहीं। भारत की पहली अंतर्राष्ट्रीय महिला वेटलिफ्टर रहने के साथ साथ उन्होंने केन्द्रीय रिजर्व बल (सी.आर.पी.एफ.) में शामिल होने के पश्चात् कुंजारानी ने पुलिस चैंपियनशिप में भी जोर आजमाइश की । 1996 से 1998 तक उन्होंने भारतीय पुलिस टीम का नेतृत्व किया ।

 


 

 2000 ओलंपिक में मौका ही नहीं मिला


कुंजरानी ने 1994 एशियन गेम्स में सिल्वर मेडल जीता, 1996 में उन्हें राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार दिया गया था मगर घुटने के ऑपरेशन से उबरती कुंजरानी 1998 के एशियन गेम्स में कोई भी मैडल जीत नहीं पाई और कुंजरानी के करियर पर सवाल उठने लगे लेकिन इन सबके बावजूद कुंजरानी को विशवास था की वह सिडनी में गोल्ड मैडल जरूर जीतेंगी लेकिन उन्हें सिडनी ओलंपिक में नहीं भेजा गया।

 


 

 


स्वर्णिम कैरियर में एक बार काला धब्बा


कुंजरानी अभी ओलंपिक के सदमे से उबर भी नहीं पाई थीं कि डोपिंग के चलते 6 महीने के लिए बैन कर दी गईं। उस समय की खबरें बताती हैं कि सैंपल लेने में लापरवाही हुई थी। उस समय पर लगभग सबने मान लिया कि 15 साल के शानदार करियर का ये दुखद अंत है। मगर किस्मत को धता बताते हुए इस वेटलिफ्टर ने एक बार फिर एथेंस ओलंपिक के लिए क्वालिफाई किया।

 



सर्वश्रेष्ठ खिलाडियों की लिस्ट में चौथा स्थान


खिलाडियों की लिस्ट में कुंजरानी को चौथी पोज़ीशन मिली इस लिस्ट में मिल्खा सिंह, पीटी ऊषा जैसे सर्वश्रेष्ठ नाम शामिल थे। ओलंपिक में मैडल न मिलने का सपना तो टूट गया मगर इस एथलीट ने अपने लड़ने का जज़्बा नहीं छोड़ा। 2006 के मेलबर्न कॉमनवेल्थ में हिंदुस्तान के लिए टूर्नामेंट का पहला गोल्ड मैडल जीता और 2006 की इस जीत के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2011 में पद्मश्री से सम्मानित किया।