मीराबाई चानू का गरीबी से गोल्ड तक का सफर, देखें तस्वीरें

Daily news network Posted: 2018-04-07 18:57:34 IST Updated: 2018-04-07 19:14:56 IST
मीराबाई चानू का गरीबी से गोल्ड तक का सफर, देखें तस्वीरें
  • भारोत्तोलक संजीता चानू ने कमर की तकलीफ से जूझने के बावजूद एक नए रिकॉर्ड के साथ राष्ट्रमंडल खेलों में लगातार दूसरा स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया।

भारोत्तोलक संजीता चानू ने कमर की तकलीफ से जूझने के बावजूद एक नए रिकॉर्ड के साथ राष्ट्रमंडल खेलों में लगातार दूसरा स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। 23 साल की मीराबार्इ चानू ने ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में राष्ट्रमंडल खेलों में 48 किलोवर्ग के भारोत्तोलन में गोल्ड मेडल जीत लिया है। स्नैच राउंड में पहले उन्होंने 80, फिर 84 और तीसरी बार में 86 किलो भार उठा कर अपने लिए स्वर्ण पदक सुरक्षित किया। इसके साथ ही उन्होंने अपना खुद का ही रिकॉर्ड तोड़ दिया है। स्नैच कैटगरी में वो पहले ही 48 किलो भार अधिक उठाने में आगे चल रही थीं। 86 किलो भार उठा कर उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स का रिकॉर्ड भी कायम किया है।



इसके बाद क्लीन एंड जर्क राउंड में मीराबाई चानू ने पहली कोशिश की और 103 किलोग्राम उठाया। दूसरी बार उन्होंने अपने ही पिछले कॉमनवेल्थ गेम्स के 103 के रिकॉर्ड को तोड़ कर 107 किलोग्राम उठाया। तीसरी बार मीराबाई ने 110 किलो उठा कर औरों से 13 किलोग्राम की बढ़त हासिल कर ली। दूसरे स्थान पर रहीं मॉरीशियस की मारिया हानिट्रा रोलिया, जिनका टोटल रहा 170 किलो। मीराबार्इ की इस गोल्डन जीत पर राजनेताआें ने उन्हें बधार्इ  दी है। आइए जानते हैं इनके जीवन से जुड़ी खास बातें...

 पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर की भारोत्तोलन खिलाड़ी साईखोम मीराबाई चानू को सोमवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्मश्री सम्मान से विभूषित किया। बता दें कि गणतंत्र दिवस के मौके पर खेल जगत में उल्लेखनीय प्रदर्शन के लिए चानू को पद्मश्री सम्मान देने की घोषणा की गई थी।

 



ये भारत की ऐसी दूसरी खिलाड़ी हैं, जिन्होंने यूएसए में आयोजित विश्व स्तर के भारोत्तोलन प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता। 2017 में चानू ने 48 किग्रा भार वर्ग में हिस्सा लेते हुए 194 किग्रा का भार उठाया था। उन्होंने पहले 85 किग्रा (स्नैच में) और फिर 109 किग्रा भार (क्लीन और जर्क में) उठाया आैर भारत को स्वर्ण पदक लाकर दिया। आपको बता दें कि इससे पहले 22 साल पहले 1994 और 1995 में कर्नाम मालेश्वरी ने स्वर्ण पदक जीता था।चानू के लिए ये मुकाम हासिल करना नहीं था आसान। इसके लिए उन्होंने दिन रात मेहनत की थी। चानू रियो आेलिम्पिक के तीन प्रयासों में भी नाकाम रही थीं। मीराबार्इ के गांव में बेटलिफ्टिंग के लिए काेर्इ सेंटर नहीं था इस वजह से वे ट्रेन से 60 किमी दूर ट्रेनिंग लेने जाया करती थी।

 2007 में जब मीराबार्इ चानू तेरह साल की थी तभी से उन्होंने इंफाल में प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया था। 2011 में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय यूथ चैंपियनशिप और दक्षिण एशियाई जूनियर खेलों में स्वर्ण जीता।दो साल बाद उन्हें जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में सर्वश्रेष्ठ भारोत्तोलक का खिताब मिला लेकिन जब उन्होंनें सीनियर स्तर पर खेलना शुरू किया तब से उनके लिए चुनौतियां बढ़ती गईं। 2014 में ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में रजत जीतने के बाद मीराबार्इ चानू के आत्मविश्वास को नई ऊंचाई मिली। कहते हैं कि अगर कुछ पाने की लगन है तो वह मुकाम हमें जरूर हासिल होता है, एेसा ही कुछ मीरा बार्इ चानू के साथ भी था।


मीरा बार्इ चानू ने जब वेटलिफ्टिंग की ट्रेनिंग शुरू की थी तब उनके घर की आर्थिक स्थित ठीक नहीं थी। इसी वजह वे उस डाइट चार्ट को भी फाॅलों नहीं कर पाती थी जो उनके कोच ने उन्हें दिया था। दरअसल, उन्हें जो डाइट चार्ट मिला था उसमें उन्हें हर रोज चिकन आैर दूध लेना जरूरी था लेकिन आर्थिक स्थित ठीक न होने के कारण वे उसे फाॅलों नहीं कर पाती थी। जिसके कारण काफी समय तक उन्हें अपर्याप्त पोषण के बावजूद वेटलिफ्टिंग करना पड़ा, जिसका बुरा असर उनके खेल पर भी पड़ा।


रियो ओलंपिक से पहले का दौर मीराबाई चानू के करियर में सबसे महत्वपूर्ण रहा है। उस दौरान उनके ज़िंदगी में एक वक्त ऐसा आया, जब उनके घर की खराब आर्थिक स्थिति की वजह से यह लगा कि वे ओलंपिक के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाएंगी। उस समय उनके घर वालों ने उनसे भारोत्तोलन छोड़ने के लिए भी कह दिया था। खुशकिस्मती से उन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया। भले ही वह वहां अच्छा नहीं खेल पाई, पर विश्व चैंपियनशिप की इस जीत ने मेरे सभी पुराने दर्द भुला था। मालूम हो कि चानू ने 31 अगस्त, 2015 को पूसी रेलवे में नौकरी प्राप्त की थी तथा वर्तमान में ये पूसी रेलवे के लामडिंग डिवीजन में सीनियर टिकट कलेक्टर हैं।

 


 

 


चानू के भाई सैखोम सांतोम्बा मीतेई ने बताया कि एक दिन मैं लकड़ी का गट्ठर उठा नहीं पाया लेकिन चानू ने उसे आसानी से उठा लिया और वह उसे करीब 2 किलोमीटर दूर हमारे घर तक ले लाई। तब वह 12 साल की थी। सातोम्बा चानू से चार साल बड़े हैं। वे सेना में सिपाही हैं और फिलहाल उनकी ड्यूटी श्रीनगर में हैं लेकिन वह अपने पुत्र के अन्नप्रसा (बच्चे को पहली बार जब अन्न खिलाया जाता है) समारोह के लिए घर आए हुए हैं।

 


राज्य स्तर के जूनियर फुटबॉलर रहे सांतोम्बा ने बताया कि मैं जब फुटबॉल खेलता था , तब मैंने उसमें(चानू) में कुछ करने का जुनून देखा था। फिर वह भारोत्तोलन से जु ड़ गई। वह कुछ हासिल करने के लिए जुनूनी थीं। वह कभी दबाव में नहीं आती। हमेशा शांत रहती है। 23 वर्षीय चानू जब कॉमनवेल्थ गेम्स में महिलाओं के 48 किलोग्राम भारवर्ग में पदक के लिए उतरी तब घरवाले और गांव के लोग टीवी पर उनका खेल देख रहे थे। जब चानू ने स्वर्ण पदक जीता तो हर कोई खुशी से उछल पड़ा।