असम में अवैध रूप से बसे बांग्लादेशी मुसलमानों की नींद उड़ी,जानिए क्यों

Daily news network Posted: 2018-01-14 16:12:38 IST Updated: 2018-01-14 16:12:38 IST
असम में अवैध रूप से बसे बांग्लादेशी मुसलमानों की नींद उड़ी,जानिए क्यों
  • असम सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान के लिए 31 दिसंबर 2017 की आधी रात राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(एनआरसी) का पहला ड्राफ्ट जारी किया।

गुवाहाटी।

असम सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान के लिए 31 दिसंबर 2017 की आधी रात राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(एनआरसी) का पहला ड्राफ्ट जारी किया। इसमें 1 करोड़ 90 लाख लोगों को ही भारत का वैध नागरिक माना गया है,जबकि दस्तावेज करीब 3 करोड़ 29 लाख लोगों ने जमा करवाए थे। मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल की ओर से कई बार भरोसा दिए जाने के बाद भी यहां के लोग डरे हुए हैं,खासतौर से बांग्लाभाषी मुसलमान। उन्हें डर है कि अगर एनआरसी की दूसरी लिस्ट में भी उनका नाम नहीं आया तो उनका क्या होगा?

 

 

 


आपको बता दें कि असम में फिलहाल ऐसे 2 हजार बांग्लाभाषी मुस्लिमों की पहचान की गई है,जिन्हें फॉरेनर ट्रिब्यूनल ने विदेशी माना है। इनके दस्तावेजों की जांच की जा रही है। जांच की प्रक्रिया पूरी होने तक इन लोगों को डिटेंशन सेंटर में रखा गया है। 25 साल के शाहजहान काजी नील असम के बारपेटा जिले के रहने वाले हैं। एनआरसी का पहला ड्राफ्ट आने के बाद से वे डरे हुए हैं।

 

 

 


एनआरसी के पहले ड्राफ्ट में इनके परिवार के एक भी सदस्य का नाम नहीं है। खुद को नास्तिक मानने वाले काजी कहते हैं, मेरे दादाजी का नाम 1951 के एनआरसी और 1966 की मतदाता सूची में दर्ज है। मेरे पिता ने 1983 में पहली बार वोट दिया था लेकिन मेरे अभिभावकों को 1997 में वोटर्स लिस्ट से हटा दिया गया। मेरे पिता ने अपनी नागरिकता साबित की लेकिन हम लोगों का नाम अभी तक एनआरसी में अपडेट नहीं किया गया है। 8 चुनावों में पोलिंग ऑफिसर के तौर पर काम करने के बाद भी उन्हें वोट देने का हक नहीं है क्योंकि उन्हें डी वोटर घोषित किया गया है। 2017 में फॉरेनर ट्रिब्यूनल से काजी को राहत मिल गई थी लेकिन अभी तक उन्हें वोटर लिस्ट में नाम दर्ज होने का इंतजार है।

 

 

 

 


फरहाद भूयां भी बारपेटा जिले के रहने वाले हैं। उन्हें खुशी है कि सरकार कामकाजी लोगों,सैनिकों,पुलिस वालों,कारोबारियों, डॉक्टरों और टीचरों के लिए काम कर रही है लेकिन वो भी डरे हुए हैं। फरहाद को चिंता है कि अगर उन्हें एनआरसी में जगह नहीं मिली तो क्या होगा? बकौल फरहाद, मैंने 1951, 1965, 1971 में सारे दस्तावेज जमा कराए। मेरे दादाजी को फस्र्ट इंडियन के रूप में चिन्हित किया गया था। 1961 से हम तरबारी गांव में रह रहे थे। कुछ सालों पहले बारपेटा में शिफ्ट हुए। सारे दस्तावेज देने के बाद भी परिवार के किसी सदस्य का नाम एनआरसी में नहीं आया है।

 

 

 

 


असम के कई इलाकों में ऐेसे कई लोग हैं,जिनकी कहानी काजी और फरहाद भूयां जैसी है। असम सरकार जल्द ही एनआरसी की दूसरी लिस्ट जारी करने वाली है। ऐसे में राज्य के बांग्लाभाषी मुस्लिमों के पास अपनी नागरिकता साबित करन का यह आखिरी मौका होगा। एनआरसी अथॉरिटी को कुल 68.27 लाख परिवारों के आवेदन मिले थे। प्रति व्यक्ति के हिसाब से इनकी संख्या कुल 3.29 करोड़ थी। पहले ड्राफ्ट में 1.9 करोड़ लोगों का नाम है। भारत के रजिस्ट्रार जनरल शैलेश के मुताबिक 1.39 करोड़ लोगों के दस्तावेजों की जांच की जा रही है। इन लोगों को परेशान होने या डरने की जरूरत नहीं है।

 

 

 

 


दस्तावेजों के वेरिफिकेशन के बाद दूसरा और तीसरा मसौदा जारी किया जाएगा। फाइनल एनआरसी साल 2018 के आखिर तक आएगा। सरकार ने लोगों से संयम बरतने की अपील की है लेकिन इसके बाद भी लोग काफी डरे हुए हैं। असम देश का एकमात्र ऐसा राज्य है,जिसका एनआरसी है। इसे पहली बार 1951 में तैयार किया गया था। उस वक्त राज्य की आबादी 80 लाख थी। आपको बता दें कि असम में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिये बड़ा मुद्दा है। इसको लेकर 80 के दशक में बड़ा आंदोलन हुआ था। सत किया जाएगा। हालांकि समझौता आगे नहीं बढ़ा।