पूर्वोत्तर के कई राज्यों में सक्रीय रहे हैं असीमानंद, आदिवासियों के बीच थी गहरी पैठ

Daily news network Posted: 2018-04-17 14:47:36 IST Updated: 2018-04-17 17:30:10 IST
  • हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए ) की विशेष अदालत ने वर्ष 2007 के मक्का मस्जिद विस्फोट से जुड़े मामले में सभी पांचों आरोपियों को बरी कर दिया।

हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए ) की विशेष अदालत ने वर्ष 2007 के मक्का मस्जिद विस्फोट से जुड़े मामले में  सभी पांचों आरोपियों को बरी कर दिया। विशेष अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद स्वामी असीमानंद, देवेंद्र गुप्ता, लोकेश शर्मा, भरत बाबू और राजेेंद्र चौधरी को बरी कर दिया। इसमें असीमानंद ऐसा चेहरा है, जिसके बार में संघ कभी भी खुलकर बात नहीं करता है। हालांकि संघ से जुड़े लोग असीमानंद को हिंदू राष्ट्र का प्रबल समर्थक मानते हैं। 


 

पूर्वोत्तर राज्यों में भी किया काम

हिंदू संगठनों से जुड़े रहे असीमानंद ने पश्चिम बंगाल, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, असम, त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम में काम किया, लेकिन गुजरात, झारखंड और अंडमान द्वीप के सुदूर इलाकों में असीमानंद ने प्रमुख रूप से काम किया और यहीं से उनकी पहचान बनी। हिंदू मान्यताओं में गहरी आस्था रखने वाले रामकृष्ण मिशन के विचारों से करीबी रखने वाले एक बंगाली परिवार में जन्मे असीमानंद ने शुरुआत से ही आदिवासियों के बीच काम किया। आरएसएस के एक सीनियर लीडर ने बताया कि एक गुरु से संन्यास लेने के बाद उन्होंने अपना नाम बदल लिया था और फिर आदिवासियों के बीच काम करने लगे।


 

शुरुआत से ही आदिवासियों के बीच काम करना चाहते थे असीमानंद 

गुजरात में असीमानंद के साथ काम कर चुके आरएसएस के एक सीनियर लीडर ने बताया कि वह शुरुआत से ही इस बात को लेकर स्पष्ट थे कि उन्हें आदिवासियों के बीच काम करना है। उन्होंने पश्चिम बंगाल से काम की शुरुआत की, जिसके बाद आरएसएस ने उन्हें 1970 के दशक में अंडमान भेजा, जहां उस दौर में संघ खुद को स्थापित करने के लिए प्रयासरत था। संघ नेता ने कहा कि असीमानंद का रामकृष्ण मिशन से मोहभंग हो गया था, लेकिन उनके स्वामी विवेकानंद और हिंदुओं के प्रति उनके योगदान को लेकर उनके मन में गहरी श्रद्धा थी। उन्होंने कहा कि वह साफ कहते थे, अधिक हिंदुओं को अपने साथ जोड़ो, लेकिन यह ध्यान रहे कि कोई भी हिंदू छोड़कर न जाए। वह कहते थे यदि एक भी हिंदू की आस्था डिगती है तो वह धर्म के लिए बड़ा खतरा है।



 

 

कई नाम हैं असीमानंद के

असीमानंद को जतिन चटर्जी उर्फ  नबाकुमार उर्फ स्वामी ओंकारनाथ के नाम से भी जाना जाता है। वह मूल रूप से पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने बॉटनी (वनस्पति विज्ञान) से ग्रेजुएशन किया। 1990 से 2007 के बीच असीमानंद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े। यहां उन्होंने वनवासी कल्याण आश्रम के प्रांत प्रचारक प्रमुख की जिम्मेदारी संभाली। 1995 के आस.-ास वह गुजरात के डांग जिले के मुख्यालय आह्वा आए, यहां हिंदू धर्म जागरण और शुद्धीकरण का काम करने लगे।


 

शबरी धाम में कुंभ का आयोजन

असीमानंद ने आह्वा में शबरी माता का मंदिर और धाम बनाया। पुलिस का दावा है कि 2006 में मुस्लिम समुदाय को आतंकित करने के लिए किए गए विस्फोटों से ठीक पहले असीमानंद ने इसी शबरी धाम में कुंभ का आयोजन किया। कुंभ के दौरान विस्फोट में शामिल करीब 10 लोग इसी आश्रम में रहे। इसके अलावा असीमानंद बिहार के पुरुलिया, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में भी सक्रिय रहे।


 

पहचान छिपाकर छिपते रहे

सीबीआई का दावा है कि स्वामी हरिद्वार में अपनी पहचान छिपाकर रह रहे थे और उन्होंने फर्जी परिचय पत्र भी हासिल किए। सीबीआई स्वामी के पास से कोलकाता से जारी हुआ पासपोर्ट, कई फर्जी राशन कार्ड और हरिद्वार प्रशासन द्वारा जारी मतदाता पहचान पत्र भी जब्त कर चुकी है। स्वामी की तलाश 2009 के बाद से शुरू हुई जब सुरक्षा एजेंसियों को यह ठोस जानकारी मिली कि आरोपी अपने भेष बदलता है। सूत्रों के मुताबिकए स्वामी की मौजूदगी के बारे में जानकारी मिलने के बाद सीबीआई तथा एटीएस (महाराष्ट्र) ने वर्ष 2009-10 में मध्य प्रदेश और गुजरात के विभिन्न स्थानों की तलाशी ली।



 


अपने बयान से पलटे थे असीमानंद

स्वामी असीमानंद को अजमेर, हैदराबाद और समझौता एक्स्प्रेस विस्फोट मामलों में 19 नवंबर 2010 को उत्तराखंड के हरिद्वार से अरेस्ट किया गया था। साल 2011 में उन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने कबूल किया था कि अजमेर की दरगाह, हैदराबाद की मक्का मस्जिद और अन्य कई स्थानों पर हुए बम धमाकों में उनका और दूसरे हिंदू चरमपंथियों का हाथ था। हालांकि, बाद में वो अपने बयान से पलट गए। असीमानंद को साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का करीबी माना जाता है। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का नाम भी मालेगांव ब्लास्ट में सामने आया था। असीमानंद 1988 तक अपने गुरु के साथ पश्चिम बंगाल के बर्धवान में ही रहते हैं।

 

 


अजमेर ब्लास्ट केस में हुए बरी

2007 में राजस्थान के अजमेर शरीफ  में हुए ब्लास्ट केस में राजस्थान एटीएस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया था। एटीएस ने देंवेंद्र गुप्ता नाम के शख्स से पूछताछ की तो उसने बताया कि इसे अंजाम देने के लिए असीमानंद और सुनील जोशी नाम के शख्स ने उस पर दबाव डाला था। हालांकि जयपुर की नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी (एनआईए) की स्पेशल कोर्ट ने अजमेर दरगाह ब्लास्ट मामले में 3 को दोषी ठहराया, जबकि 5 को बरी कर दिया था।  कोर्ट से आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार को क्लीन चिट मिल गइ। स्वामी असीमानंद को भी बरी कर दिया है। भावेश और देवेंद्र गुप्ता को दोषी ठहराया। मृतक सुनील जोशी को भी दोषी ठहराया गया।