Tripura election 2018 Live Update: चारिलाम सीट पर 80 फीसदी से ज्यादा वोटिंग

Daily news network Posted: 2018-03-12 13:45:15 IST Updated: 2018-03-13 13:31:24 IST
Tripura election 2018 Live Update: चारिलाम सीट पर 80 फीसदी से ज्यादा वोटिंग
  • त्रिपुरा की चारिलाम सीट पर हुए चुनाव में 80 फीसदी से ज्यादा वोटिंग हुई है। सीपीआई(एम) उम्मीदवार रामेंद्र नारायण देबबर्मा की 11 फरवरी को चुनाव प्रचार के दौरान मौत के हो जाने की वजह से इस सीट का चुनाव टाल दिया गया था।

अगरतला।

त्रिपुरा की चारिलाम सीट पर हुए चुनाव में 80 फीसदी से ज्यादा वोटिंग हुई है। सीपीआई(एम) उम्मीदवार रामेंद्र नारायण देबबर्मा की 11 फरवरी को चुनाव प्रचार के दौरान मौत के हो जाने की वजह से इस सीट का चुनाव टाल दिया गया था।


 इससे पहले रविवार को इस सीट से सीपीआई(एम) ने त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव के बाद जारी हिंसा के विरोध में अपना उम्मीदवार हटा लिया था। इस पर बीजेपी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वामपंथियों ने मैदान छोड़ दिया।

 


 सीपीएम के मैदान छोड़ने के बाद इस सीट पर भाजपा के सबसे अमीर विधायक व उपमुख्यमंत्री जिष्णु देबबर्मा का मुकाबला आईएनपीटी के उमा शंकर देबबर्मा, कांग्रेस के अर्जून देबबर्मा और निर्दलीय उम्मीदवार ज्योतिलाल देबबर्मा से होगा। बर्मा के पास11 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति घोषित है। उपमुख्यमंत्री पद की शपत ग्रहण के बाद जिष्णु को बिजली, ग्रामीण विकास, वित्त, योजना और समन्वय विभाग का प्रभार दिया गया है।

 इस सीट पर पहले सीपीएम का दबदवा रहा है। अब तक हुए 10 विधानसभा चुनावों में इस सीट पर 5 बार सीपीएम, 3 बार कांग्रेस और एक एक बार सीपीआई व टीयूएस के उम्मीदवार ने इस सीट से जीत दर्ज की है।



1967 से 1972 तक यह सीट एसटी के लिए रिजर्व थी। 1977 में यह जनरल सीट हो गई। 19 83 के विधानसभा चुनाव में फिर एसटी के लिए रिजर्व हो गई। 1988 में फिर जनरल सीट हो गई।



1993 से लेकर पिछले विधानसभा चुनाव तक यह सीट एसटी के लिए ही रिजर्व थी। इस सीट से सीपीएम के रामेन्द्र नारायण देबबर्मा ने सबसे ज्यादा मतों से जबकि नारायण रुपिनी ने सबसे कम वोटों से जीत दर्ज की थी। पिछले विधानसभा चुनाव में सीपीएम के रामेन्द्र नारायण देबबर्मा ने कांग्रेस की हिमानी देबबर्मा को 1,341 वोटों से हराया था। देबबर्मा को कुल 16,479 वोट मिले थे जबकि हिमानी को 15,138।  1967 में यहां से सीपीआई के ए.डी.बर्मा ने कांग्रेस के के.सी.डी.बर्मा को 193 वोटों से हराया था। बर्मा को कुल 7,230 वोट मिले थे जबकि कांग्रेस के उ मीदवार को मिले थे 7,037।


1972 के चुनाव में कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बदल लिया। हालांकि वह भी चुनाव जीत नहीं पाए। सीपीएम के निरंजन देब ने कांग्रेस के मनमोहन सिंह को 331 वोटों से हरा दिया। देब को कुल 2,805 वोट मिले जबकि देबबर्मा को 2,474। 1977 के चुनाव में सीपीएम ने उ मीदवार बदल लिया लेकिन पार्टी चुनाव हार गई। टीयूएस के हरीनाथ देबबर्मा ने सीपीएम के दुर्गा प्रसाद सिकदर को 1,028 वोटों से मात दी। हरीनाथ देबबर्मा को कुल वोट मिले 4,259 जबकि सिकदर को मिले 3,231।



1983 के चुनाव में जब यह सीट फिर एसटी के लिए सुरक्षित हो गई तो कांग्रेस ने जीत दर्ज की। कांग्रेस के परीमल चंद्र साहा ने सीपीएम के ब्रज गोपाल भौमिक को 1,226 वोटों से हरा दिया। साहा को कुल वोट मिले 8,528 जबकि भौमिक को मिले 7,302। 1988 के विधानसभा चुनाव में यहां से फिर कांग्रेस ने जीत दर्ज की। कांग्रेस के मतिलाल साहा ने सीपीएम के ब्रजगोपाल भौमिक को 908 वोटों से मात दी। साहा को कुल वोट मिले 9,680 जबकि भौमिक को 8,772।

 



1993 में यह सीट फिर एसटी के लिए आरक्षित हो गई। कांग्रेस के अशोक देब बर्मा ने सीपीआई के अघोर देबबर्मा को 664 वोटों से हराया। बर्मा को कुल वोट मिले 10, 292 जबकि अघोर देबबर्मा को मिले 9, 628। 1998 में सीपीएम के नारायण रुपिनी ने आईएनडी के अनंत देबबर्मा को 1,006 वोटों से हराया। रुपिनी को कुल वोट मिले 10, 815 जबकि देबबर्मा को मिले 9,809। 2003 में भी नारायण रुपिनी ने जीत दर्ज की। उन्होंने आईएनपीटी के नरेन्द्र देबबर्मा को सिर्फ 56 वोटों से हराया। नारायण रुपिनी को 10,573 वोट मिले जबकि नरेन्द्र देबबर्मा को 10,517 मत पड़े। 2008 में सीपीएम के नारायण रुपिनी ने फिर जीत दर्ज की। उन्होंने फिर आईएनपीटी के नरेन्द्र देबबर्मा को हराया। इस बार 487 वोटों से जीत दर्ज की।

 बता दें कि तीन मार्च को आए चुनाव परिणामों में भाजपा ने त्रिपुरा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के 25 साल के शासन का अंत किया। साठ सदस्यीय विधानसभा की 59 सीटों के आए परिणामों में भाजपा को 35 सीटों पर विजय मिली थी। भाजपा ने विधानसभा चुनाव आईएफजीटी के साथ मिलकर लड़ा था। आईएफजीटी को आठ सीटें मिली थीं। जबकि सीपीएम सिर्फ 16 सीटों पर सिमट गई।