सड़क हादसे में मारा गया उल्फा चीफ परेशा बरुआ

Daily news network Posted: 2018-11-07 11:51:10 IST Updated: 2018-11-09 09:03:07 IST
सड़क हादसे में मारा गया उल्फा चीफ परेशा बरुआ
  • भारतीय खुफिया एजेंसियों ने दावा किया है कि प्रतिबंधित संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम-इंडिपेंडेंट (उल्फा-आर्इ) चीफ परेश बरुआ की मौत हो चुकी है।

गुवाहाटी।

भारतीय खुफिया एजेंसियों ने दावा किया है कि प्रतिबंधित संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम-इंडिपेंडेंट (उल्फा-आर्इ) चीफ परेश बरुआ की मौत हो चुकी है। आॅनलाइन न्यूज मैगजीन की एक रिपोर्ट के मुताबिक सीनो बर्मीज बॉर्डर पर हुर्इ एक सड़क दुर्घटना में उन्हें गंभीर चोटें आर्इ जिस कारण से बरुआ की मौत हो गर्इ। बता दें कि मैगजीन में यह खबर बुधवार को प्रकाशित की गर्इ।

 


 रिपाेर्ट में कहा गया है कि खुफिया सेवाएं अभी बरुआ की मौत की पुष्टि करने के लिए जांच में जुटी हैंं।  कहा जा रहा है कि दुर्घटना में बरुआ की कर्इ पसलियां आैर एक पैर टूट गया था। रिपार्ट में दुर्घटना के सही स्थान के बारे में नहीं बताया गया है लेकिन कहा जा रहा है कि सीनो बर्मीज बॉर्डर के आस पास ही दुर्घटना हुर्इ है।

 

 

 एक वरिष्ठ खुफिया अधिकारी ने बताया कि हम दुर्घटना की पुष्टि के लिए बरुआ की मौत की जांच कर रहे हैं। बता दें कि परेश बरूआ असम में प्रतिबंधित संगठन उल्फा का चीफ था। 


परेश बरूआ ने की थी उल्फा की स्थापना

 बता दें कि 1979 में असम में बाहरी लोगों को खदेड़ने के लिए एक आंदोलन चरम पर था। इस आंदोलन के पीछे असम का ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन नाम का संगठन था। उसी समय परेश बरुआ ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर 7 अप्रैल, 1979 को उल्फा की शिवसागर में स्थापना की। परेश बरुआ के अन्य साथी राजीव राज कंवर उर्फ अरबिंद राजखोवा, गोलाप बरुआ उर्फ अनुप चेतिया, समीरन गोगोई उर्फ प्रदीप गोगोई और भद्रेश्वर गोहैन थे।

 


असम को एक स्वायत्त और संप्रभु राज्य बनाना था उल्फा का मकसद

 

उल्फा की स्थापना का मकसद सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से असम को एक स्वायत्त और संप्रभु राज्य बनाना था। 1986 तक गुपचुप तरीके से उल्फा काम करता रहा। इस बीच इसने काडरों की भर्ती जारी रखी। फिर इसने प्रशिक्षण और हथियार खरीदने के मकसद से म्यांमार काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी (केआईए) और नैशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन) से संपर्क स्थापित किया। इन दोनों संगठनों के संपर्क में आने के बाद उल्फा का खूनी खेल शुरू होता है।

 

 

 

उल्फा की मांग न मानने पर कर दी जाती  है हत्या

 

प्रशिक्षण और हथियार खरीदने के लिए पैसे का जुगाड़ करने के लिए उल्फा अपहरण के वसूली का धंधा शुरू कर दिया। उल्फा लोगों का अपहरण करके उसकी आड़ में वसूली करता था। इसके अलावा चाय बागानों से भी इसने वसूली करना शुरू कर दिया और उल्फा की मांग न मानने की स्थिति में लोगों की हत्या कर दी जाती। उल्फा ने बड़ी संख्या में असम के बाहर से आए लोगों की हत्या की ताकि लोग भयभीत होकर राज्य छोड़कर चले जाएं। इसने असम के तिनसुकिया और डिब्रुगढ़ जिलों में अपने शिविर स्थापित किए।

 


 केंद्र सरकार का ऐक्शन

 जब उल्फा की हिंसक गतिविधि काफी बढ़ गई तो भारत सरकार ने उस पर अंकुश लगाने के लिए कदम उठाए। 1990 में केंद्र सरकार ने उल्फा पर प्रतिबंध लगा दिया और इसके खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किए। 1998 के बाद से बड़ी संख्या में उल्फा के सदस्यों ने आत्मसमर्पण कर दिया और संगठन के सक्रिय आतंकी भूटान, बर्मा और बांग्लादेश के शिविरों में रह गए।