चारीलाम सीट से भाजपा ने उतारा सबसे पैसे वाला कैंडिडेट,सीपीएम के गढ़ में लगा पाएंगे सेंध

Daily news network Posted: 2018-02-12 19:55:23 IST Updated: 2018-02-12 19:55:23 IST
चारीलाम सीट से भाजपा ने उतारा सबसे पैसे वाला कैंडिडेट,सीपीएम के गढ़ में लगा पाएंगे सेंध
  • त्रिपुरा के विधानसभा चुनाव में सभी की नजरें चारीलाम सीट पर रही है। यहां से भाजपा ने सबसे अमीर उ मीदवार को मैदान में उतारा है, जिनका नाम है जिष्णु देवबर्मा। जिष्णु देवबर्मा ने 11 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति घोषित है।

अगरतला

 त्रिपुरा के विधानसभा चुनाव में सभी की नजरें चारीलाम सीट पर रही है। यहां से भाजपा ने सबसे अमीर उ मीदवार को मैदान में उतारा है, जिनका नाम है जिष्णु देवबर्मा। जिष्णु देवबर्मा ने 11 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति घोषित है। जिष्णु देवबर्मा भाजपा की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य हैं। इस सीट पर शुरू से ले ट का दबदबा रहा है। 10 में से 5 बार सीपीएम,3 बार कांग्रेस और एक एक बार सीपीआई व टीयूएस के उ मीदवार ने जीत दर्ज की है। पिछले चुनाव(2013) में यहां से सीपीएम के रामेन्द्र नारायण देबबर्मा ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने कांग्रेस प हिमानी देबबर्मा को 1,341 वोटों से हराया था। देबबर्मा को कुल 16, 479 वोट पड़े थे जबकि हिमानी को 15,138।

 



सीपीएम ने एक बार फिर रामेन्द्र नारायण देबबर्मा पर दांव लगाया है जबकि कांग्रेस ने अपना उ मीदवार बदल लिया है। उसने अर्जुन देबबर्मा को चुनाव मैदान में उतारा है। आईएनपीटी ने उमा शंकर देबबर्मा को अपना उ मीदवार बनाया है। ज्योतिलाल देबबर्मा बतौर निर्दलीय उ मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। आपको बता दें कि सीपीएम के नारायण रुपिनी यहां से तीन बार चुनाव जीत चुके हैं। आईएनपीटी के नरेन्द्र चंद्र देबनाथ ने दो बार चुनाव लड़ा और दोनों बार हार का मुंह देखना पड़ा। 1967 से 1972 तक यह सीट एसटी के लिए रिजर्व थी। 1977 में यह जनरल सीट हो गई। 19 83 के विधानसभा चुनाव में फिर एसटी के लिए रिजर्व हो गई। 1988 में फिर जनरल सीट हो गई।

 


1993 से लेकर पिछले विधानसभा चुनाव तक यह सीट एसटी के लिए ही रिजर्व थी। इस सीट से सीपीएम के रामेन्द्र नारायण देबबर्मा ने सबसे ज्यादा मतों से जबकि नारायण रुपिनी ने सबसे कम वोटों से जीत दर्ज की थी। पिछले विधानसभा चुनाव में सीपीएम के रामेन्द्र नारायण देबबर्मा ने कांग्रेस की हिमानी देबबर्मा को 1,341 वोटों से हराया था। देबबर्मा को कुल 16, 479 वोट मिले थे जबकि हिमानी को 15,138।  1967 में यहां से सीपीआई के ए.डी.बर्मा ने कांग्रेस के के.सी.डी.बर्मा को 193 वोटों से हराया था। बर्मा को कुल 7,230 वोट मिले थे जबकि कांग्रेस के उ मीदवार को मिले थे 7,037।

 



1972 के चुनाव में कांग्रेस ने अपना उ मीदवार बदल लिया। हालांकि वह भी चुनाव जीत नहीं पाए। सीपीएम के निरंजन देब ने कांग्रेस के मनमोहन सिंह को 331 वोटों से हरा दिया। देब को कुल 2,805 वोट मिले जबकि देबबर्मा को 2,474। 1977 के चुनाव में सीपीएम ने उ मीदवार बदल लिया लेकिन पार्टी चुनाव हार गई। टीयूएस के हरीनाथ देबबर्मा ने सीपीएम के दुर्गा प्रसाद सिकदर को 1,028 वोटों से मात दी। हरीनाथ देबबर्मा को कुल वोट मिले 4,259 जबकि सिकदर को मिले 3,231।

 


1983 के चुनाव में जब यह सीट फिर एसटी के लिए सुरक्षित हो गई तो कांग्रेस ने जीत दर्ज की। कांग्रेस के परीमल चंद्र साहा ने सीपीएम के ब्रज गोपाल भौमिक को 1,226 वोटों से हरा दिया। साहा को कुल वोट मिले 8,528 जबकि भौमिक को मिले 7,302। 1988 के विधानसभा चुनाव में यहां से फिर कांग्रेस ने जीत दर्ज की। कांग्रेस के मतिलाल साहा ने सीपीएम के ब्रजगोपाल भौमिक को 908 वोटों से मात दी। साहा को कुल वोट मिले 9,680 जबकि भौमिक को 8,772।

 



1993 में यह सीट फिर एसटी के लिए आरक्षित हो गई। कांग्रेस के अशोक देब बर्मा ने सीपीआई के अघोर देबबर्मा को 664 वोटों से हराया। बर्मा को कुल वोट मिले 10, 292 जबकि अघोर देबबर्मा को मिले 9, 628। 1998 में सीपीएम के नारायण रुपिनी ने आईएनडी के अनंत देबबर्मा को 1,006 वोटों से हराया। रुपिनी को कुल वोट मिले 10, 815 जबकि देबबर्मा को मिले 9,809। 2003 में भी नारायण रुपिनी ने जीत दर्ज की। उन्होंने आईएनपीटी के नरेन्द्र देबबर्मा को सिर्फ 56 वोटों से हराया। नारायण रुपिनी को 10,573 वोट मिले जबकि नरेन्द्र देबबर्मा को 10,517 मत पड़े। 2008 में सीपीएम के नारायण रुपिनी ने फिर जीत दर्ज की। उन्होंने फिर आईएनपीटी के नरेन्द्र देबबर्मा को हराया। इस बार 487 वोटों से जीत दर्ज की।