मिलिए सेना के उस योद्धा से, जिन्हें नागालैंड समस्या के हल के लिए मिला था पद्मभूषण

Daily news network Posted: 2018-04-09 15:30:07 IST Updated: 2018-04-09 16:47:47 IST
मिलिए सेना के उस योद्धा से, जिन्हें नागालैंड समस्या के हल के लिए मिला था पद्मभूषण

कोहिमा।

सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष थे। उनका जन्म 3 अप्रैल, 1914 को और निधन 27 जून 2008 को हुआ था। फील्ड मार्शल की रैंक पाने वाले वह भारतीय सेना के पहले अधिकारी थे। सन 1971 में उन्हीं के नेतृत्व में भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ। खास बता यह है कि भारत की आजादी के बाद गोरखों की कमान संभालने वाले वे पहले भारतीय अधिकारी थे। गोरखों ने ही उन्हें सैम बहादुर के नाम से सबसे पहले पुकारना शुरू किया था। तरक्की की सीढिय़ां चढ़ते हुए सैम को नागालैंड समस्या को सुलझाने के अविस्मरणीय योगदान के लिए 1968 में पद्मभूषण से नवाजा गया।



 




गोरखा रेजिमेंट के लिए कही थी ऐसी बात

उन्हें सेना की गोरखा रेजिमेंट पर उनका कितना भरोसा था, यह उनके एक बयान से पता चलता है। एक बार उन्होंने गोरखा रेजिमेंट की तारीफ  करते हुए कहा, अगर आपसे कोई कहता है कि वह मौत से नहीं डरता है तो वह या तो झूठा है या फिर गोरखा।



 


कमांडिंग अफसर को भेजा था चूडिय़ों का पार्सल

मिजोरम में एक बटालियन उग्रवादियों से लड़ाई में हिचक रही थी और लड़ाई को टालने की कोशिश कर रही थी। इसके बारे में जब मानेकशॉ को पता चला तो उन्होंने चूडिय़ों का एक पार्सल बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर को एक नोट के साथ भेजा। नोट में लिखा था कि अगर आप दुश्मन से लडऩा नहीं चाहते हैं तो अपने जवानों को ये चूडिय़ां पहनने को दे दें। जब बटालियन ने ऑप्रेशन को सफलतापूर्वक अंजाम दे दिया तो उन्होंने चूडिय़ां वापस भेज देने को कहा। 

 

 


भारत-पाकिस्तान युद्ध में हासिल की थी विजय

बता दें कि शानदार मिलिट्री करियर ब्रिटिश इंडियन आर्मी से शुरू हुआ और 4 दशकों तक चला, जिसके दौरान पांच युद्ध भी हुए। सन 1969 में वह भारतीय सेना के आठवें सेनाध्यक्ष बनाए गए और उनके नेतृत्व में भारत ने सन 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में विजय प्राप्त की, जिसके फलस्वरूप एक नए राष्ट्र बांग्लादेश का जन्म हुआ। उनके शानदार करियर के दौरान उन्हें अनेकों सम्मान प्राप्त हुए।

 


 

कभी डॉक्टर बनना चाहते थे मानेकशॉ

मानेकशॉ का जन्म अमृतसर में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनका परिवार गुजरात के शहर वलसाड से पंजाब आ गया था। सैम ने पंजाब और नैनीताल में शेरवुड कॉलेज से अपनी शिक्षा पूरी की थी, जिसमें कैंब्रिज बोर्ड की स्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा में डिस्टिंक्शन भी था। स्कूल के बाद उन्होंने अपने पिता से गुजारिश की थी कि वह उन्हें लंदन भेज दें ताकि वो मेडिसिन की पढ़ाई कर सकें। हालांकि, उनके पिता ने इसलिए रजामंदी नहीं दी, क्योंकि वो विदेश में अकेले रहने के लिहाज से बहुत छोटे थे।

 

 


कई गोलियां लगने के बावजूद लड़ते रहे

पिता के फैसले पर विद्रोह जताते हुए मानेकशॉ ने इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आईएमए) की प्रवेश परीक्षा दी और 1 अक्टूबर 1932 को देहरादून में 40 कैडेटों के पहले बैच में चुन लिए गए।  सैम को दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बर्मा के मोर्चे पर भेजा गया। वहां फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट के कैप्टन के तौर पर जापानियों से मुकाबला करते हुए वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उन्हें कई गोलियां लगी थी, लेकिन वे बहादुरी से अपने साथी सैनिकों  हौंसला अफजाई करते रहे। जब उन्हें अस्पताल ले जाया गया तो इलाज के दौरान सर्जन ने उनसे पूछा कि उनको क्या हुआ था तो मानेकशॉ ने मजाकिया लहजे में जवाब दिया, ष्मुझे गधे ने लात मार दिया था।



 

हाजिर जवाबी में माहिर थे

जब 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच की जंग छिडऩे वाली थी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जनरल मानेकशॉ से पूछा कि क्या लड़ाई के लिए तैयारियां पूरी हैं। इस पर मानेकशॉ ने हाजिर जवाब देते हुए कहा कि आई ऐम ऑलवेज रेडी स्वीटी।  इंदिरा गांधी जैसी एक कड़क स्वभाव की महिला और देश की प्रधानमंत्री को स्वीटी कहने का हौंसला और हुनर केवल मानेकशॉ के पास ही था।



 

तख्तापलट की कोशिश का मामला

एक बार अफवाह उड़ी कि मानेकशॉ आर्मी की मदद से इंदिरा गांधी के तख्तापलट की कोशिश करने वाले हैं। इंदिरा ने सैम को बुलाकर इस बारे में सीधा सवाल किया कि क्या ये खबर सच है। इस पर सैम ने इंदिरा को बेबाक जवाब दिया कि आप अपना काम देखिए, मैं अपना काम देख रहा हूं, जब तक आर्मी में मेरे काम में कोई दखल नहीं देगा, तब तक मैं राजनीति में दखल नहीं दूंगा।

 



 

वीरता के लिए मिले हैं अनेकों सम्मान

बता दें कि 1937 में एक सार्वजनिक समारोह के लिए लाहौर गए सैम की मुलाकात सिल्लो बोडे से हुई। दो साल की यह दोस्ती 22 अप्रैल 1939 को विवाह में बदल गई। 1969 को उन्हें सेनाध्यक्ष बनाया गया और 1973 में फील्ड मार्शल का सम्मान प्रदान किया गया। 1973 में सेना प्रमुख के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वे वेलिंगटनए तमिलनाडु में बस गए थे। वृद्धावस्था में उन्हें फेफड़े संबंधी बिमारी हो गई थी और वे कोमा में चले गए। उनकी मृत्यु वेलिंगटन के सैन्य अस्पताल के आईसीयू में 27 जून 2008 को रात 12.30 बजे हुई। सैम मानेकशॉ को उनकी सेवाओं तथा वीरता के लिए सैन्य क्रॉस, पद्म भूषण तथा पद्म विभूषण से सम्मानित किया था।