एक खूंखार उग्रवादी की आश्रम के वातावरण ने बदल दी जिंदगी, कुछ ऐसी है रमन डेका की कहानी

Daily news network Posted: 2018-04-07 14:06:22 IST Updated: 2018-04-07 14:39:11 IST
एक खूंखार उग्रवादी की आश्रम के वातावरण ने बदल दी जिंदगी, कुछ ऐसी है रमन डेका की कहानी
  • ये कहानी असम के रहने वाले 46 वर्षीय रमन डेका की है। रमन डेका कभी उग्रवादी संगठन उल्फा से जुड़े थे।

गुवाहाटी।

ये कहानी असम के रहने वाले 46 वर्षीय रमन डेका की है। रमन डेका कभी उग्रवादी संगठन उल्फा से जुड़े थे। संगठन में इतने जल्दी पांव जमाए कि क्षेत्रीय मुख्य सचिव का दर्जा पा लिया। ज्यादा तबाही मचाने के लिए रमन ने तीन महीने का विशेष प्रशिक्षण भी लिया। धीरे-धीरे क्षेत्र में रमन का डंका बचने लगा, लोग उनसे खौफ खाने लगे। हालांकि इस बीच रमन ने आत्मसमर्पण कर लिया, लेकिन मुसीबतों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। सरकार ने पुनवार्स को लेकर कदम नहीं उठाए, ऐसे में शराब की लत लग गई। आखिरकार राज्य सरकार ने रमन को आर्ट ऑफ  लिविंग आश्रम और यहीं से उनकी जिंदगी बदल उठी।

 

 

बचपन में उठ गया था पिता का साया

बता दें कि रमन का जन्म असम के दरंग जिले में एक बेहद गरीब परिवार में हुआ। महज दो साल की उम्र में ही पिता का साया सिर से उठ गया। गुस्सैल स्वभाव का रमन जल्द ही उल्फा के प्रभाव में आ गया। रमन को उग्रवादी नेताओं का भरोसा जीतने में वक्त नहीं लगा और जल्द ही उसे उल्फा का क्षेत्रीय मुख्य सचिव बन गया। हालांकि 1993 में सेना ने रमन को गिरफ्तार कर लिया और एक साल तक जेल में बंद रखा। जेल से छूटते ही रमन दोबारा उग्रवादी गतिविधियां में शामिल हो गया। ज्यादा तबाही मचाने के लिए उसे तीन महीने का विशेष प्रशिक्षण भी दिया गया। इसके बाद रमन एक बार फिर असम पुलिस के हत्थे चढ़ा। हालांकि यह उस वक्त का दौर था जब कई उग्रवादी समर्पण करके मुख्यधारा में शामिल हो रहे थे।

 



आत्मसमर्पण के बाद संघर्ष करते रहे रमन

रमन के अनुसार उस वक्त एक पुलिस अधिकारी सहयोग के बाद उसने आत्मसमर्पण करने का फैसला किया। इसके बाद रमन को तीन महीने की जेल के बाद ही रिहा कर दिया गया। रिहाई के वक्त रमन से पुनर्वास के कई वायदे किए गए, लेकिन बाद पुलिस और सरकार दोनों उन्हें भूल गई। नतीतजन रमन को शराब की लत लग गई। रमन का कहना है कि उग्रवादी साये के चलते मुख्यधारा के समाज में मेरे लिए अपनी जगह ढूंढ पाना मुश्किल हो रहा था। उग्रवाद छोडऩे के बावजूद समाज में लोग मुझसे डरते थे। उनका डर जायज था, कई मौकों पर मेरे जैसे उग्रवादियों की वजह से निर्दोष व्यक्तियों को भी पुलिस की प्रताडऩा झेलनी पड़ी थी। सामाजिक अस्वीकार्यता के बावजूद मैंने दोबारा उल्फा से जुडऩे का विचार नहीं किया, क्योंकि मैंने बहुत ईमानदारी से समर्पण किया था।

 




सरकार ने भेजा ऑर्ट ऑफ लिविंग

रमन के अनुसार, वर्षों तक ऐसे ही जिल्लत भरा सिलसिला चलता रहा। एक दिन मेरे ही जैसे एक पूर्व उग्रवादी ने मुझे सरकार से अपना हक मांगने की सलाह दी। मैंने आवेदन किया, तो एक लंबे वक्त के बाद मुझे सरकारी पत्र मिला, जिसमें मुझसे मेरे जैसे लोगों की सूची मांगी गई थी। मैंने सब कुछ वैसा ही किया, जैसा मुझसे कहा गया। फलस्वरूप मुझे 220 पूर्व उल्फा सदस्यों के साथ प्रशिक्षण के लिए आर्ट ऑफ  लिविंग आश्रम भेजा गया। मुझे उस वक्त भी सरकार की मंशा पर शक हुआ कि आश्रम में भेजकर हमारा पुनर्वास कैसे होगा, पर मेरी आशंका गलत निकली। आश्रम के वातावरण ने मुझ पर गहरा असर डाला।

 



अब गांव में लोगों के लिए शिविर लगा रहे हैं रमन

रमन ने बताया कि वापस गांव लौटकर मैंने दूसरों के लिए शिविर का आयोजन किया। लोग मेरा बदला स्वरूप देखकर चकित थे। मगर आज मुझे देखकर कोई चकित नहीं होता है, क्योंकि विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों की मदद से मैं पूरे गांव का चहेता बन गया हूं। उल्फा से जुडऩे के वक्त लोग डर की वजह से मेरा सम्मान करते थे, लेकिन अब मेरे प्रति सम्मान में उनका प्यार देखा जा सकता है।