असम की तर्ज पर अब इस राज्य में भी एनआरसी लागू करने की मांग

Daily news network Posted: 2019-09-07 09:11:30 IST Updated: 2019-09-07 09:21:14 IST
असम की तर्ज पर अब इस राज्य में भी एनआरसी लागू करने की मांग
  • हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने मांग की है कि उनके राज्य में भी असम की तर्ज पर राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी की कवायद की जाए। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि इससे देश के नागरिकों और अवैध प्रवासियों में फर्क पता चल सकेगा।

नई दिल्ली

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने मांग की है कि उनके राज्य में भी असम की तर्ज पर राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी की कवायद की जाए। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि इससे देश के नागरिकों और अवैध प्रवासियों में फर्क पता चल सकेगा।


 मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि मौजूदा हालात में इसकी काफी जरूरत है। हरियाणा में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने हैं। बता दें कि असम में 3.30 करोड़ आवेदकों में से 3.11 करोड़ लोगों को जगह मिली है, यानी 19 लाख लोग इस सूची से बाहर हो चुके हैं। बता दें कि इससे पहले मसौदा एनआरसी की सूची जारी हुई थी। इस सूची में करीब 41 लाख लोगों का नाम शामिल नहीं था।



लिए गए बायोमैट्रिक डेटा


एनआरसी अधिकारियों ने 30 जुलाई 2018 को प्रकाशित मसौदा एनआरसी में जगह नहीं बना पाए ऐसे लोगों का बायोमैट्रिक डेटा लिया है, जिन्होंने भारतीय नागरिकता का दावा किया था। इस बायोमीट्रिक डेटा की वजह से आधार कार्ड बनाना संभव हो सकेगा। राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी) में अंतिम रूप से अपना नाम नहीं जुड़वा पाने वाले लोग अगर कानूनी प्रक्रिया के पालन के बाद भी अपनी भारतीय नागरिकता सिद्ध नहीं कर पाते हैं तो वे देश में कहीं से भी अपना आधार कार्ड नहीं बनवा सकेंगे, क्योंकि उनके बायोमीट्रिक्स के आगे निशान बना होगा।



3.29 करोड़ लोगों ने किया था आवेदन


गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, एनआरसी दावों की प्रक्रिया के दौरान लिए गए बायोमीट्रिक डेटा यह सुनिश्चित करेंगे कि जिन लोगों ने अंतिम एनआरसी में जगह बना ली है वे आधार पाएं और जो अपनी भारतीय नागरिकता सिद्ध नहीं कर सके वे देश में कहीं इसे न बनवा पाएं। जब मसौदा एनआरसी प्रकाशित हुई थी तब 40.7 लाख लोगों को इसमें जगह नहीं मिलने पर काफी विवाद हुआ था। इस मसौदे में कुल 3.29 करोड़ आवेदकों में से 2.9 करोड़ के नाम शामिल थे।



 1985 में हुआ था समझौता


बता दें कि पहला रजिस्टर 1951 में जारी हुआ था। ये रजिस्टर असम का निवासी होने का सर्टिफिकेट है। इस मुद्दे पर असम में कई बड़े और हिंसक आंदोलन हुए हैं। 1947 में बंटवारे के बाद असम के लोगों का पूर्वी पाकिस्तान में आना-जाना जारी रहा। 1979 में असम में घुसपैठियों के खिलाफ ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने आंदोलन किया। इसके बाद 1985 को तब की केंद्र में राजीव गांधी सरकार ने असम गण परिषद से समझौता किया। इसके तहत 1971 से पहले जो भी बांग्लादेशी असम में घुसे हैं, उन्हें भारत की नागरिकता दी जाएगी।