पूर्वोत्तर की शांति को इन उग्रवादी संगठनों की लगी है नजर

Daily news network Posted: 2018-04-10 17:27:36 IST Updated: 2018-04-10 17:56:01 IST
पूर्वोत्तर की शांति को इन उग्रवादी संगठनों की लगी है नजर
  • यहां कई उग्रवादी संगठनों ने अपनी जड़ें इतनी गहरी कर ली हैं, उन्हें खत्म करना मुश्किल हो रहा है।

इंफाल

आजादी के इतने साल बाद भी पूर्वोत्तर पूर्ण रूप से उग्रवाद से मुक्त नहीं हुआ है। यहां कई उग्रवादी संगठनों ने अपनी जड़ें इतनी गहरी कर ली हैं, उन्हें खत्म करना मुश्किल हो रहा है। हालांकि केंद्र सरकार लगातार प्रयास कर उग्रवादियों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रही है। उग्रवाद के पीछे के कारणों को टटोला जाए तो सामने आता है कि ये लोग खुद को भारत का हिस्सा नहीं मानते हैं। आजादी से पहले यहां कबीलों या फिर राजाओं का शासन था, लेकिन विलय के बाद इन लोगों को लगता है कि उनको जबदस्ती भारत में मिलाया गया है। ऐसे में इस खबर में उन उग्रवादी समूहों के बारे में जानने की कोशिश करते हैं, जिन्हें समूचे पूर्वोत्तर को आजादी से अब तक कई बार धहला दिया।

 

 



नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ  नागालैंड

मणिपुर के चंदेल जिले में सेना के काफिले पर हमले की जिम्मेवारी लेनेवाले एनएससीएन-खापलांग गुट की स्थापना 30 अप्रैल, 1988 को हुई थी। यह संगठन मूल नागा अलगाववादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ  नागालैंड में दो नागा जातीय समूहों (कोंयाक और तांग्खुल) में विवाद का परिणाम था। कोंयाक तबके ने खोले कोंयाक और एसएस खापलांग के नेतृत्व में एनएससीएन (खापलांग) बनाया। तांग्खुल तबके,  एनएससीएन (आइजक-मुइवा) के नेता आइजक चिसी स्वू और टी मुइवा हैं। एसएस खापलांग के नेतृत्व में गुट पूर्वोत्तर के नागा बहुल तथा म्यांमार के कुछ इलाकों को मिला कर ग्रेटर नागालैंड बनाना चाहता है। नागालैंड के पूर्वी हिस्से और अरुणाचल के तिराप व चांगलांग जिलों में यह गिरोह सक्रिय है। हालांकि खापलांग की हाल ही में हुई मौत के बाद ये गुट कमजोर होता दिख रहा है।

 

 



कांग्लेईपाक कम्युनिस्ट पार्टी, मणिपुर

मणिपुर को भारत से अलग करने और मेतेई संस्कृति की रक्षा करने के उद्द्ेश्य से 13 अप्रैल 1980 को कांग्लेईपाक कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ। इसके नाम में जुड़ा कांग्लेईपाक मणिपुर का ऐतिहासिक नाम है। साल 1995 में इसका संस्थापक प्रमुख इबोहांबी सुरक्षा बलों द्वारा मारा गया था। उसके बाद यह संगठन कई गुटों में बंट गया था, लेकिन खबरों के अनुसार 2006 के मई महीने में साझा बैठक में इन गुटों ने फिर से एक होने का निर्णय किया था।

 

 



कांग्लेई यावोल कान्ना लुप

कांग्लेई यावोल कान्ना लुप की बात करे तो यह गुट मणिपुर के चार जिलों इंफाल पूर्व, बिशेनपुर, थुबाल और इंफाल पश्चिम में सक्रिय था। इस गुट की स्थापना कई उग्रवादी समूहों ने मिलकर 1994 में की थी। मेतेई तबके के हितों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाला यह गुट अनैतिक गतिविधियों, भ्रष्टाचार और नशाखोरी को जुटा है।

 

 

 



ङोलियांगग्रॉंग युनाइटेड फ्रंट

वर्ष 2011 में मणिपुर में स्थापित यह गुट ङोलियांगग्रॉंग इंपुइए चिरु और अन्य क्षेत्रीय अल्पसंख्यकों के हितों का प्रतिनिधित्व का दावा करता है। भारतीय सुरक्षा बलों के अलावा इसका मुख्य संघर्ष आइजक-मुइवा के एनएससीएन गुट से हैण् इस गिरोह का अध्यक्ष कामसन है और मुख्य कमांडर जैनचुइ कामेई हैं।





यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ  असम (उल्फा)

पूर्वोत्तर के इस सबसे हिंसक और ताकतवर उग्रवादी संगठन का गठन सात अप्रैल 1979 को असम के सिबसागर में हुई थी। अविभाजित उल्फा में उसके राजनीतिक इकाई की जिम्मेवारी अरबिंद राजखोवा की थी, जबकि उसके मिलिट्री इकाई को परेश बरुआ संभालता था। वर्ष 1986 में इस गुट ने अविभाजित एनएससीएन और म्यांमार के काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी से प्रशिक्षण और हथियारों के लिए संपर्क किया था। बाद में उसके तार पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आईएसआई और अफगान लड़ाकों से भी जुड़े। वर्ष 2011 के पांच फरवरी को उलफा के शीर्ष नेताओं के एक बड़े धड़े ने यह घोषणा की कि संगठन बिना किसी पूर्व शर्त के भारत सरकार से बातचीत के लिए तैयार है। हालांकि परेश बरुआ के नेतृत्व में संगठन के एक तबके ने सरकार से बातचीत के निर्णय को खारिज कर दिया। केंद्र सरकार, असम सरकार और उल्फा के एक गुट के साथ तीन सितंबर 2011 को हुए समझौते में तीनों पक्षों ने अपनी संबंधित गतिविधियों को रोकने की घोषणा कर दी।अगस्तए 2012 में परेश बरुआ द्वारा अरबिंद राजखोवा को निष्कासित कर अभिजीत बर्मन को संगठन का मुखिया बनाने के निर्णय के साथ ही उल्फा का औपचारिक विभाजन हो गया।

 

 

 

नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ  बोडोलैंड  

तीन अक्तूबर, 1986 में रंजन दैमरी के नेतृत्व में एक अतिवादी संगठन बोडो सिक्यूरिटी बल के नाम से बनाया गया था, जिसका नाम 25 नवंबर 1994 को बदलकर नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ  बोडोलैंड कर दिया गया। 2005 से इस संगठन और असम तथा केंद्र सरकारों के बीच युद्धविराम की स्थिति है, परंतु अभी तक कोई औपचारिक शांति-वार्ता शुरू नहीं हो सकी है। इस संगठन का उद्देश्य ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तर के बोडो-बहुल क्षेत्रों को मिलाकर स्वतंत्र और संप्रभु बोडोलैंड की स्थापना है। रंजन दैमरी की जगह 2008 के दिसंबर महीने में धीरेन बोरो को गुट का अध्यक्ष बनाया गया था।