मेघालय चुनाव में कोयला सिंडिकेट पर सभी राजनीतिक दल मौन

Daily news network Posted: 2018-02-15 07:51:13 IST Updated: 2018-02-15 07:51:13 IST
मेघालय चुनाव में कोयला सिंडिकेट पर सभी राजनीतिक दल मौन
  • मेघालय में कोयला बहुल क्षेत्रों में छिद्र बनाकर कोयला निकालने की विधि पर प्रतिबंध का मसला आगामी विधानसभा चुनावों में बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियां अभी तक इस पर अपना स्पष्ट रूख नहीं बना पाई हैं जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान हो रहा है।

जोवाई/शिलांग।

मेघालय में कोयला बहुल क्षेत्रों में छिद्र बनाकर कोयला निकालने की विधि पर प्रतिबंध का मसला आगामी विधानसभा चुनावों में बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियां अभी तक इस पर अपना स्पष्ट रूख नहीं बना पाई हैं जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान हो रहा है।

 


 राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने चार वर्ष पहले कोयला निकालने की इस विधि पर रोक लगा दी थी जिससे जनजातीय आबादी के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है और इस क्षेत्र से जुड़े अनेक लोग एक तरह से तबाह हो गए हैं।

 


 इस विधि में छोटे-छोटे छिद्र बनाकर कोयला निकाला जाता है और इसमें परिवार के सभी सदस्य काम में लगे रहते हैं। प्राधिकरण ने इस विधि को पर्यावरण के लिए नुकसानदेह, गैरकानूनी और अवैज्ञानिक करार दिया है।

 


 पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से यह कदम उठाया गया है। प्राधिकरण के इस फैसले से मेघालय के जैंतिया हिल्स के खेलरीहित और लाद्रिमबाई क्षेत्रों के लोग काफी गुस्से में है और यह प्रतिबंध एक तरह से उनके लिए एक झटके की तरह की है जिससे राज्य की पूरी कोयला अर्थव्यवस्था एक तरह से ठहर सी गई है। इस फैसले से काफी लोग और कारोबारियों के समक्ष आजीविका का संकट पैदा हो गया है और कोयला खनन मालिक दिवालिया हो गए हैं और चारों तरफ निराशा का माहौल है।

 


 लाद्रिमबाई के एक कोयला खदान मालिक ने बताया कि यह हमारे पर एक अप्रत्याशित प्रहार जैसा है और हमने इसके बारे में तो कभी कल्पना भी नहीं की थी। कईं दशकों से इसी विधि से कोयला निकाला जा रहा था।

 


 सरकार ने इस मामले में कोई भी राहत वाला काम नहीं किया और एक तरह से हम सड़कों पर हैं। मेघालय जो छठी अनुसूची का राज्य है, वहां के जनजातीय लोगों का मानना है कि यहां के कोयला बहुल क्षेत्रों में उनका हक है और केन्द्र सरकार के खनन संबंधी कानून यहां लागू नहीं होते, लेकिन कोयला खदान (राष्ट्रीयकरण) कानून,1973 के अनुसार कोयला खदान सीधे उसके अधिकार क्षेत्र में आती हैं। इसी बात को लेकर कोयला खदान मालिक और लोग सरकार से सवालिया निशान कर रहे हैं कि वह इस मामले में कोई पहल क्यों नहीं कर रही है।

 


 एक कोयला खदान कारोबारी ने कहा, 'सरकार पारंपरिक तरीके से खनन करने की इस विधि में अदालत में अपना पक्ष सही तरीके से नहीं रख पाई है। इस पूरे मामले में कांग्रेस की ही भूमिका है और इसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है।'

 


 चुनाव मैदान में ताल ठोक रही सभी बड़ी पार्टियां -भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और एनपीपी के लिए यह मसला गले की फांस बनता जा रहा है और उनके लिए इस पर कोई भी निर्णय लेना काफी कठिन है। मेघालय भाजपा प्रदेश इकाई के अध्यक्ष शिब्यून लिंगदोह ने इस मामले में प्रतिक्रिया करते हुए कहा कि इस मसले के समाधान के लिए हम हरित प्राधिकरण के साथ मिलकर काम करेंंगें।