बाहरी बनाम असमिया मुद्दे की जड़ है काफी पुरानी, जानिए क्या है असम समझौता

Daily news network Posted: 2018-04-21 16:02:17 IST Updated: 2018-04-21 17:02:47 IST
बाहरी बनाम असमिया मुद्दे की जड़ है काफी पुरानी, जानिए क्या है असम समझौता
  • असम में अवैध रूप से रहे बांग्लादेशियों की पहचान की जा रही हैं जिसके लिए काफी राज्य में एनआरसी प्राक्रिया चल रही है

गुवाहाटी

असम में अवैध रूप से रहे बांग्लादेशियों की पहचान की जा रही हैं, जिसके लिए राज्य में एनआरसी प्राक्रिया चल रही है। इसके पहले मसौदे के तहत राज्य के कुल 3.29 करोड़ आवेदनों में से 1.9 करोड़ लोगों को कानूनी रूप से भारत का नागरिक माना गया है।

 

 


आवैध नागरिकों का यह मामला राज्य के लिए नया नहीं है बल्कि यह हमेशा से ही एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा रहा है, जिसको लेकर इन दिनों राज्य में एनआरसी प्राक्रिया चल रही हैं और सभी लोगों से असम समझौते के तहत 1971 से पहले राज्य में रहने के सबूत मांगे जा रहे। 


 जनसंख्या विस्फोट


असम में बाहरी बनाम असमिया के मसले पर आन्दोलनों का दौर काफी पुराना है। राज्य में 50 के दशक से ही बाहरी लोगों का असम में आना एक राजनैतिक मुद्दा बनने लगा था। 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान और आज के बांग्लादेश में मुसलमान बंगालियों के खिलाफ पाकिस्तानी सेना की हिंसक कार्रवाई शुरू हुई तो वहां के तकरीबन 10 लाख लोगों ने असम में शरण ली। बांग्लादेश बनने के बाद इनमें से ज्यादातर लोग लौट गए, लेकिन तकरीबन 1 लाख असम में ही रह गए। जल्द ही स्थानीय लोगों को लगने लगा कि बाहर से आये लोग उनके संसाधनों पर कब्जा कर लेंगे और इस तरह जनसंख्या में हो रहे इन बदलावों ने असम के मूल निवासियों में भाषाई, सांस्कृतिक और राजनीतिक असुरक्षा की भावना पैदा कर दी।

 



1978 के बाद बढ़ा विरोध

असमिया लोगों में राज्य के संसाधनों और भाषाई, सांस्कृतिक और राजनीतिक असुरक्षा के भय ने 1978 के आस-पास एक शक्तिशाली आन्दोलन  का रूप ले लिया, जिसका नेतृत्व वहां के युवाओं और छात्रों ने किया। इसी बीच All Assam Students Union (AASU) और All Assam Gana Sangram Parishad (AAGSP) ने मांग की कि विधान सभा चुनाव कराने से पहले विदेशी घुसपैठियों की समस्या का हल निकाला जाए। उन्होंने बांग्लादेशियों को वापस भेजने के अलावा 1961 के बाद राज्य में आने वाले लोगों को वापस राज्य में भेजे जाने या उन्हें कई और बसाने की मांग की।


 राजनीतिक अस्थिरता का माहौल

समय के साथ आन्दोलन उग्र होता गया और राजनीतिक अस्थिरता का माहौल पैदा हो गया और यही कारण था कि 1983 के विधान सभा चुनाव में राज्य की बड़ी आबादी ने मतदान का बहिष्कार किया। इस बीच राज्य में आदिवासी, भाषाई और साम्प्रदायिक पहचानों के नाम पर बड़े पैमाने पर हिंसा हुई और  1984 के आम चुनावों में राज्य के 14 संसदीय क्षेत्रों में चुनाव ही नहीं हो पाए, जिसके बाद अगस्त 1985 को केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार और आन्दोलन के नेताओं के बीच समझौता हुआ, जिसे असम समझौते (Assam Accord) के नाम से जाना जाता है। 



असम समझौता

असम समझौते के तहत 1951 से 1961 के बीच असम आये सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट देने का अधिकार देने का फैसला हुआ और 1971 के बाद असम में आए लोगों को वापस भेजने पर सहमति बनी। 1961 से 1971 के बीच आने वाले लोगों को नागरिकता और दूसरे अधिकार जरुर दिए गए, लेकिन उन्हें वोट का अधिकार नहीं दिया गया।  केंद्र सरकार ने यह भी फैसला किया कि असमिया भाषी लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान की सुरक्षा के लिए विशेष कानून और प्रशासनिक उपाय किये जायेंगे।


 कांग्रेस ने दबाव में आकर किया काम

असम समझौते के आधार पर मतदाता सूची में संशोधन किया गया विधान सभा को भंग करके 1985 में चुनाव कराये गए, जिसमें नवगठित असम गणपरिषद् को बहुमत मिला और AASU के अध्यक्ष प्रफुल्ल कुमार महंत को मुख्यमंत्री बनाया गया। असम समझौते (Assam Accord) के बाद राज्य में शांति बहाली तो हुई, लेकिन यह असल मायने में अमल नहीं हो पाया। कई साल तक मामला ठन्डे बस्ते में रहने के बाद साल 2005 में एक बार फिर असम में आन्दोलन तेज हुआ राज्य में कांग्रेस सरकार ने दबाव में आकर काम शुरू तो किया, लेकिन कार्रवाई बेहद सुस्त रही।

 


 असम एकमात्र ऐसा राज्य, जिसके पास एनआरसी

असम एकमात्र ऐसा राज्य है, जिसके पास एनआरसी है। इसे सबसे पहले वर्ष 1951 में तैयार किया गया था। 20वीं सदी से ही राज्य में बांग्लादेश से लोगों का प्रवाह रहा है। संपूर्ण प्रक्रिया पर निगरानी रख रहे उच्चतम न्यायालय ने करीब दो करोड़ दावों की जांच के बाद 31 दिसंबर तक एनआरसी का पहला मसौदा प्रकाशित किया गया।