Independence Day: 17 साल की उम्र में ही इस विरांगना के मन में अंकुरित हुआ था राष्ट्र प्रेम, देश के लिए हुई थी शहीद

Daily news network Posted: 2019-08-15 10:26:26 IST Updated: 2019-08-15 14:27:04 IST
  • आज हमारा देश भारत 73वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। भारत को आजादी दिलाने के लिए लाखों लोगों ने कुर्बानियां दी थी। इनमें कुछ लोगों को हम जानते हैं और उन्हें बड़ी ही शिद्दत से याद करते हैं। लेकिन इनमें कुछ ऐसे भी है जिन्हाेंने बहुत छोटी सी उम्र में अपनी जान को देश के लिए कुर्बान कर दिया।

नई दिल्ली/गुवाहाटी।

आज हमारा देश भारत 73वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। भारत को आजादी दिलाने के लिए लाखों लोगों ने कुर्बानियां दी थी। इनमें कुछ लोगों को हम जानते हैं और उन्हें बड़ी ही शिद्दत से याद करते हैं। लेकिन इनमें कुछ ऐसे भी है जिन्हाेंने बहुत छोटी सी उम्र में अपनी जान को देश के लिए कुर्बान कर दिया। इस क्रम में सबसे पहला नाम भगत सिंह का आता है लेकिन आज हम आपको नार्थ ईस्ट की ऐसी वीरागंना के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने देश के लिए अपनी जान दे दी लेकिन तिरंगे को झुकने नहीं दिया। हम बात कर रहे हैं विरांगना कनकलता बरुआ की।



बता दें कि कनकलता बरुआ का जन्म 22 दिसंबर, 1924 को असम के बांरगबाड़ी गांव में कृष्णकांत बरुआ के घर में हुआ था। कनकलता बचपन में ही अनाथ हो गई थी। कनकलता के पालन–पोषण का दायित्व उनकी नानी को संभालना पड़ा। इन सबके बावजूद कनकलता का झुकाव राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की ओर होता गया। जब मई 1931 ई. में गमेरी गांव में रैयत सभा आयोजित की गई, उस समय कनकलता केवल सात वर्ष की थी। फिर भी सभा में अपने मामा देवेन्द्र नाथ और यदुराम बोस के साथ उसने भी भाग लिया। सभा के अध्यक्ष प्रसिद्ध नेता ज्योति प्रसाद अग्रवाला थे। ज्योति प्रसाद अग्रवाल असम के प्रसिद्ध कवि थे और उनके द्वारा असमिया भाषा में लिखे गीत घर–घर में लोकप्रिय थे। अग्रवाल के गीतों से कनकलता भी प्रभावित और प्रेरित हुई। इन गीतों के माध्यम से कनकलता के बाल–मन पर राष्ट्र–भक्ति का बीज अंकुरित हुआ।



सन 1931 के रैयत अधिवेशन में भाग लेने वालों को राष्ट्रद्रोह के आरोप में बंदी बना लिया गया। इसी घटना के कारण असम में क्रांति की आग चारों ओर फैल गई। मुम्बई के कांग्रेस अधिवेशन में 8 अगस्त, 1942 को ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित हुआ। यह ब्रिटिश के विरुद्ध देश के कोने-कोने में फैल गया। असम के शीर्ष नेता मुंबई से लौटते ही पकड़कर जेल में डाल दिये गये। अंत में ज्योति प्रसाद आगरवाला को नेतृत्व संभालना पड़ा। उनके नेतृत्व में गुप्त सभा की गई। एक गुप्त सभा में 20 सितंबर, 1942 ई. को तेजपुर की कचहरी पर तिरंगा झंडा फहराने का निर्णय लिया गया। उस समय तक कनकलता विवाह के योग्य हो चुकी थीं। किंतु वह अपने विवाह की अपेक्षा भारत की आजादी को अधिक महत्त्वपूर्ण मान चुकी थीं।




20 सितंबर, 1942 के दिन तेजपुर से 82 मील दूर गहपुर थाने पर तिरंगा फहराया जाना था। कनकलता भी अपनी मंजिल की ओर चल पड़ीं। आत्म बलिदानी जत्था थाने के करीब जा पहुंचा। पीछे से जुलूस के गगनभेदी नारों से आकाश गूंजने लगा। उस जत्थे के सदस्यों में थाने पर झंडा फहराने की होड़-सी मच गई। थाने के प्रभारी ने कनकलता से कहा कि यदि तुम लोग एक इंच भी आगे बढ़े तो गोलियों से उड़ा दिए जाओगे। इसके बावजूद भी महज 17 साल की कनकलता आगे बढ़ीं और पुलिस ने जुलूस पर गोलियों की बौछार कर दी। पहली गोली कनकलता ने अपनी छाती पर झेली। गोली बोगी कछारी नामक सिपाही ने चलाई थी। दूसरी गोली मुकुंद काकोती को लगी, जिससे उसकी तत्काल मृत्यु हो गई। इन दोनों की मृत्यु के बाद भी गोलियां चलती रहीं। शहीद मुकंद काकोती के शव को तेजपुर नगरपालिका के कर्मचारियों ने गुप्त रूप से दाह–संस्कार कर दिया, किंतु कनकलता का शव स्वतंत्रता सेनानी अपने कंधों पर उठाकर उसके घर तक ले जाने में सफल हो गए। उसका अंतिम संस्कार बांरगबाड़ी में ही किया गया।