भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग करने वाले जज ने दिया ये अहम फैसला

Daily news network Posted: 2018-12-24 15:13:49 IST Updated: 2018-12-25 08:20:41 IST
  • मेघालय हाईकोर्ट के जज जस्टिस एसआर सेन ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस सेन ने उस शख्स की नियुक्ति बहाल करने का आदेश दिया जिसे चर्च के एक अन्य संप्रदाय में शादी करने की वजह से नौकरी से निकाल दिया गया था।

इंफाल।

मेघालय हाईकोर्ट के जज जस्टिस एसआर सेन ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस सेन ने उस शख्स की नियुक्ति बहाल करने का आदेश दिया जिसे चर्च के एक अन्य संप्रदाय में शादी करने की वजह से नौकरी से निकाल दिया गया था। जस्टिस सेन हाल ही में उस वक्त सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने टिप्पणी की थी कि पाकिस्तान ने खुद को इस्लामिक राष्ट्र के आधार पर भारत से अलग किया था। धर्म के आधार पर बंटे भारत को भी खुद को हिंदू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए, लेकिन वो अभी भी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। 

 


दासुक्लांग खरजाना 2015 से मेघायल के किंशी प्रेस्बिटेरियन अपर प्राइमरी स्कूल में असिस्टेंट टीचर के पद पर थे। इस साल जुलाई में मौखिक आदेश के बाद उनकी सेवा अचानक रोक दी गई। इसके पीछे वजह यह थी कि प्रेस्बिटेरियन समुदाय से आने वाले खरजाना ने एक कैथलिक से शादी की थी। उसके बाद खरजाना ने स्कूल के कई चक्कर काटे जाने यह जानने के लिए उन्हें नौकरी से हटाने की वजह आखिर उनकी शादी कैसे हो गई। स्कूल प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिलने की वजह से खरजाना ने मेघालय हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। गुरुवार को जस्टिस एसआर सेन की सिंगल बेंच ने इस मामले पर नाराजगी जाहिर करते हुए खरजाना को दोबारा नियुक्त किए जाने का आदेश दिया। 


 


साथ ही खरजाना के बकाये के लिए 50 हजार रुपए मुआवजे के रूप में देने के लिए कहा। जस्टिस सेन ने अपने आदेश में कहा, शुरुआत में मैंने पूरे मामले में अपनी नाराजगी जाहिर की थी। कोई भी अथॉरिटी अंतरजातीय या फिर अलग संप्रदाय में हुई शादी को नहीं रोक सकता है। यह पूरी तरह से दो लोगों का व्यक्तिगत मामला है। इसका उनकी नौकरी से कोई लेना देना नहीं है। जज सेन ने कहा, दोनों पार्टियों के वकीलों द्वारा दिए गए तर्कों पर विचार करने के बाद मैं वास्तव में सदमे में हूं कि 21 वीं सदी में भी हम इस तरह के संकीर्ण दृष्टिकोण से गुजर रहे हैं। खरजाना ने अपनी याचिका में कहा कि उनसे जबरन इस्तीफा लिया जाना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14,16, 19, 21 और 26 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का हनन है।