भाजपा के लिए ऋषियामुख सीट जीतना नामुमकिन,जानिए क्यों

Daily news network Posted: 2018-02-14 15:32:03 IST Updated: 2018-02-14 15:42:48 IST
भाजपा के लिए ऋषियामुख सीट जीतना नामुमकिन,जानिए क्यों
  • त्रिपुरा के विधानसभा चुनाव में सभी की नजरें ऋषियामुख सीट पर लगी हुई है। इस सीट पर सीपीएम का दबदबा रहा है। यहां कुल मतदाताओं की संख्या 43,131 है। इनमें से 22,335 पुरुष और 20, 796 महिला मतदाता हैं।

अगरतला।

त्रिपुरा के विधानसभा चुनाव में सभी की नजरें ऋषियामुख सीट पर लगी हुई है। इस सीट पर सीपीएम का दबदबा रहा है। यहां कुल मतदाताओं की संख्या 43,131 है। इनमें से 22,335 पुरुष और 20, 796 महिला मतदाता हैं। इस सीट पर अब तक कुल 9 बार विधानसभा चुनाव हुए हैं। 1972 और 1993 के विधानसभा चुनाव को छोड़ दें तो सीपीएम के बादल चौधरी ने इस सीट से 7 बार जीत दर्ज की है। दो बार यहां से कांग्रेस जीती है। इस बार यहां त्रिकोणीय मुकाबला है। कांग्रेस ने एक बार फिर दिलीप चौधरी पर दांव लगाया है। चौधरी चार बार यहां से चुनाव लड़ चुके हैं। तीन बार उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा जबकि एक बार जीत नसीब हुई।

 


 बादल चौधरी 1977 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर पहली बार विधायक बने थे। इसके बाद उन्होंने 1983 और 1988 में भी यहां से जीत दर्ज की। 1993 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का स्वाद चखना पड़ा। इसके बाद चौधरी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1998 से लेकर 2013 तक लगातार वह यहां से चुनाव जीतते आ रहे हैं। भाजपा ने यहां से आशेष वैद्य को चुनाव मैदान में उतारा है।

 

 सुदर्शन मजूमदार बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। इस सीट से सबसे ज्यादा वोटों से जीतने वाले सीपीएम के बादल चौधरी हैं। उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सुशंकर भौमिक को 12, 429 वोटों से हराया था। बादल को कुल 25 हजार जबकि भौमिक को 12,580 वोट मिले थे।

 

 सबसे कम वोटों से जीतने वाले उम्मीदवार भी बादल चौधरी ही हैं। 1983 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने यह सीट सिर्फ 1,501 वोटों से जीती थी। चौधरी ने कांग्रेस के अमल मलिक को हराया था। चौधरी को कुल 9, 204 और मलिक को 7,703 वोट मिले थे। 1972 के विधानसभा चुनाव में यहां से कांग्रेस के चंद्र शेखर दत्ता ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने सीपीएम के अमलेंदु चक्रवर्ती को 3,298 वोटों से हराया था। दत्ता को कुल 5,911 जबकि अमलेंदु को 2,613 वोट मिले थे। 1977 में कांग्रेस यहां से हार गई। सीपीएम के बादल चौधरी ने कांग्रेस के अरुण चंद्र भौमिक को 2,343 वोटों से हराया था।

 

 चौधरी को कुल 7,552 जबकि भौमिक को 5,209 वोट मिले। 1983 में यह सीट फिर सीपीएम के खाते में गई। इस बार बादल चौधरी ने कांग्रेस के अमाल मलिक को 1,501 वोटों से हराया। चौधरी को कुल 9,204 जबकि मलिक को 7,703 वोट मिले। 1988 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बदल दिया लेकिन इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ। पार्टी फिर चुनाव हार गई। इस बार सीपीएम के बादल चौधरी ने कांग्रेस के देबब्रत वैद्य को 1,940 वोटों से हराया। चौधरी को कुल 11,479 जबकि वैद्य को 9,539 वोट मिले। 

 1993 के विधानसभा चुनाव में बादल चौधरी चुनाव हार गए। कांग्रेस के दिलीप चौधरी ने उन्हें 6,998 वोटों से हराया। दिलीप चौधरी को कुल 15,420 जबकि बादल चौधरी को 8,422 वोट मिले। 1998 के चुनाव में बादल चौधरी ने वापसी की और कांग्रेस के दिलीप चौधरी को 8, 493 वोटों से हराया। बादल चौधरी को कुल 15,999 जबकि दिलीप चौधरी को 7,506 वोट मिले। 1998 से चौधरी लगातार इस सीट से चुनाव जीतते आ रहे हैं। 2003 के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के दिलीप चौधरी को 10, 065 वोटों से मात दी। बादल चौधरी को कुल 18,052 जबकि दिलीप चौधरी को 7, 987 वोट मिले। 2008 के चुनाव में कांग्रेस ने फिर दिलीप चौधरी पर दांव लगाया लेकिन वह फिर चुनाव हार गए। सीपीएम के बादल चौधरी ने इस बार दिलीप चौधरी को 7,761 वोटों से हराया। बादल चौधरी को कुल 19, 610 जबकि दिलीप चौधरी को 11,849 वोट मिले।