Indira gandhi का सबसे करीबी था ये 'मुस्लिम', देश के सर्वोच्च पद पर बैठकर तोड़ा दिया था मिथक

Daily news network Posted: 2018-05-13 15:42:50 IST Updated: 2018-08-31 11:10:57 IST
 Indira gandhi का सबसे करीबी था ये 'मुस्लिम', देश के सर्वोच्च पद पर बैठकर तोड़ा दिया था मिथक
  • फख़रुद्दीन अली अहमद का राष्ट्रपति चुना जाना भी भारतवर्ष की धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था का एक ज्वलंत प्रमाण था।

फख़रुद्दीन अली अहमद का राष्ट्रपति चुना जाना भी भारतवर्ष की धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था का एक ज्वलंत प्रमाण था। 'मुस्लिम वर्ग को स्वतंत्र भारत में सम्मान नहीं प्राप्त हो सकेगा' इस कल्पित आधार के कारण भारत का विभाजन किया गया था। मुस्लिम लीग और उसके नेताओं ने सत्ता लोलुपता के कारण परस्पर सौहार्द्र को भी भारी क्षति पहुंचाई थी। लेकिन फ़ख़रुद्दीन अली अहमद के रूप में जब दूसरा मुस्लिम व्यक्ति भारत का राष्ट्रपति बना तो यह स्पष्ट हो गया कि भारतीय संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता का विश्व में कोई सानी नहीं है। वे भारत के पांचवें राष्ट्रपति और कार्यकाल के अनुसार यह छठे राष्ट्रपति के रूप में जाने जाते हैं।

 


 फ़ख़रुद्दीन अली अहमद का जन्म 13 मई, 1905 को पुरानी दिल्ली के हौज़ क़ाज़ी इलाक़े में हुआ था। इनके पिता का नाम 'कर्नल जलनूर अली अहमद' और दादा का नाम 'खलीलुद्दीन अहमद' था। फ़ख़रुद्दीन अली अहमद के दादा असम के गोलाघाट शहर के निकट कदारीघाट के निवासी थे, जो असम के सिवसागर में स्थित था। इनके दादा का निकाह उस परिवार में हुआ था, जिसने औरंगज़ेब द्वारा असम विजय के बाद औरंगज़ेब के प्रतिनिधि के रूप में असम पर शासन किया था। फ़ख़रुद्दीन अली अहमद के पिता तब अंग्रेज़ सेना में इण्डियन मेडिकल सर्विस के तहत कर्नल के पद पर थे। इन्हें एक घटना के कारण असम छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था।


 एक दिन फ़ख़रुद्दीन अली अहमद के पिता कर्नल जलनूर अली अपने साथियों तथा कर्नल सिबरान बोरा के साथ शिलांग क्लब के एक समारोह में यूरोपियन अतिथियों से अलग स्थान पर बैठे हुए थे। तभी दो असमी कर्नलों ने समारोह का यह कहते हुए बहिष्कार कर दिया कि उन्हें समारोह में पृथक् रखा गया है। इससे समारोह में व्यवधान पड़ा और कुछ कुपित यूरोपियन अधिकारियों ने कर्नल जलनूर अली अहमद का स्थानांतरण उत्तर पश्चिमी इलाके में कर दिया। स्थानांतरण के बाद जलनूर अली अहमद को लोहारी के नवाब के क़रीब आने का मौक़ा प्राप्त हुआ, जब यह दिल्ली में थे। उस परिचय के बाद नवाब जियाउद्दीन अहमद के साथ कर्नल जलनूर अली अहमद की निकटता काफ़ी बढ़ गई। फिर 1900 में इनका निकाह नवाब साहब की पोती के साथ पढ़ दिया गया लोहारु स्टेट के नवाब की पौत्री के साथ निकाह होना बेहद सम्मान की बात थी। इनकी बेगम का नाम रुकैय्या था। फ़ख़रुद्दीन अली अहमद इनके ही पुत्र हैं। फ़ख़रुद्दीन अली अहमद के चार भाई और पांच बहनें थीं। यह अपने माता-पिता की चौथी संतान थे।

 


 फ़ख़रुद्दीन अली अहमद न केवल एक नामी मुस्लिम घराने में पैदा हुए थे, बल्कि इनके परिवार में बेहद सम्पन्नता और शिक्षा के प्रति अच्छी जागृति भी थी। इनकी आरंभिक शिक्षा उत्तर प्रदेश के गोंडा में सरकारी हाई स्कूल में सम्पन्न हुई, लेकिन 1918 में पिता का स्थानांतरण दिल्ली हो गया। तब यह भी दिल्ली आ गए। उस समय वह सातवीं कक्षा के छात्र थे। 1921 में उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद फ़ख़रुद्दीन अली अहमद प्रसिद्ध स्टीफन कॉलेज में दाखिल हुए। कुछ समय पश्चात् यह उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैण्ड चले गए। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अंतर्गत इनका दाखिला सेंट कैथरिन कॉलेज में हो गया। 1927 में फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने स्नातक स्तर की शिक्षा तथा 1928 में विधि की शिक्षा सम्पन्न कर ली। विधि की डिग्री लेने के बाद यह भारत लौट आए और पंजाब हाई कोर्ट में वकील के तौर पर नामांकित हुए।


 व्यवसाय

 फ़ख़रुद्दीन अली अहमद अपने पिता के मित्र मुहम्मद शफी जो पेशे से एक एडवोकेट थे उनके सहयोग में आकर एक सहयोगी के रूप में विधि व्यवसाय करने लगे। लेकिन कुछ समय बाद पिता की प्रेरणा से फ़ख़रुद्दीन अली असम चले गए। इन्होंने अपने गृह राज्य के गोहाटी हाई कोर्ट में विधि व्यवसाय आरंभ किया। कुछ समय बाद इन्हें बड़ी सफलता प्राप्त हुई। यह उच्चतम न्यायालय में बतौर वरिष्ठ एडवोकेट के रूप में कार्य करने लगे। फ़ख़रुद्दीन अली के पिता कर्नल जलनूर अली अहमद एक राष्ट्रवादी शख़्स थे लेकिन स्वयं फ़ख़रुद्दीन अली ने उनसे एक क़दम आगे रहते हुए 1931 में अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता प्राप्त कर ली। 1937 में यह असम लेजिसलेटिव असेम्बली में सुरक्षित मुस्लिम सीट से निर्वाचित हुए। लेकिन तब वह एक स्वतंत्र उम्मीदवार की हैसियत से असेम्बली में पहुंचे थे। जवाहरलाल नेहरू की सलाह पर ही उन्होंने स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर स्वयं को नामांकित किया था। यह पहले जवाहरलाल नेहरू के नजदीक आए। उसके बाद नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से इनकी अंतरंगता बढ़ गई। जवाहरलाल नेहरू ने इन्हें कांग्रेस की कार्य समिति का सदस्य बनाया। 1964 से 1974 तक यह कार्य समिति और केन्द्रीय संसदीय बोर्ड में रहे।


 1938 में जब गोपीनाथ बोरदोलोई के नेतृत्व में असम में कांग्रेस की संयुक्त सरकार बनी तो फ़ख़रुद्दीन अली अहमद को वित्त एवं राजस्व मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया। वित्त और राजस्व विभाग का दायित्व संभालते हुए इन्होंने विशिष्ट एवं उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की तथा राज्य की वित्तीय स्थिति में अपेक्षित सुधार किया। 15 नवम्बर 1939 को मुख्यमंत्री गोपीनाथ ने राज्यपाल को अपना त्यागपत्र दे दिया। इस कारण वित्त एवं राजस्व मंत्री के रूप में इनका कार्यकाल काफ़ी संक्षिप्त रहा।


महात्मा गांधी के नेतृत्व में जब सत्याग्रह आंदोलन शुरू हुआ तो फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने भी उसमें भाग लिया। इस कारण अंग्रेज़ सरकार ने इन्हें 13 अप्रैल 1940 को गिरफ्तार करके एक वर्ष के लिए जेल में डाल दिया। रिहा होने कुछ समय पश्चात् इन्हें सुरक्षा कारणों से पुन: गिरफ्तार कर लिया गया। इस बार इन्हें अप्रैल 1945 तक साढ़े तीन वर्ष जेल भुगतनी पड़ी।


दाम्पत्य जीवन

 फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने विवाह का निर्णय काफ़ी समय बाद किया। उन्होंने 9 नवम्बर 1945 को 40 वर्ष की उम्र में आबिदा हैदर के साथ निकाह किया। आबिदा हैदर के वालिद का नाम मुहम्मद सुलतान हैदर 'जोश' था। यह अंग्रेज़ी हुकूमत की सिविल सर्विस में थे। बेगम आबिदा का जन्म हरदोई उत्तर प्रदेश में 17 जुलाई, 1923 को हुआ था। निकाह के समय इनकी आयु 22 वर्ष थी और इनके शौहर इनसे 18 वर्ष बड़े थे।


फ़ख़रुद्दीन अली अहमद की पत्नी आबिदा बेगम ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी। देर से विवाह होने के बावजूद इनका दाम्पत्य जीवन सफल रहा और इन्हें तीन संतानों की प्राप्ति हुई। प्रथम संतान के रूप में इन्हें पुत्र प्राप्त हुआ, जिसका नाम परवेज अहमद रखा गया। दूसरी संतान पुत्री थी, जिसका नाम समीना रखा गया और सबसे छोटी संतान के रूप में पुत्र का नाम दुरेज अहमद रखा गया। फ़ख़रुद्दीन अली अहमद की शरीके-हयात आबिदा बेगम सुलझे विचारों वाली एक शिक्षित महिला थीं और फाइन आर्ट्स में इनकी काफ़ी रुचि थी। वह सांस्कृतिक गतिविधियों में भी उत्साह से भाग लेती थीं। आबिदा बेगम ने इंदिरा कांग्रेस के टिकट पर बरेली उत्तर प्रदेश की सीट से लोकसभा का उपचुनाव जीता और जून 1981 में सांसद निर्वाचित हुईं। लोकसभा सदस्या के रूप में इन्होंने बरेली की जनता में अपनी विशिष्ट साख बनाई। इस कारण बरेली की ही संसदीय सीट से यह 1984 में पुन: लोकसभा में पहुंचीं।


 राजनीतिक जीवन

 11 फरवरी, 1946 को गोपीनाथ बोरदोलोई के नेतृत्व में असम में कांग्रेस की सरकार बनी। लेकिन इस बार के चुनाव में फ़ख़रुद्दीन अली अहमद हार गए। परंतु कांग्रेस के अनुरोध पर उन्होंने असम के एडवोकेट जनरल का पदभार संभाला और 1952 तक इस पद पर बने रहे। 1952 में इन्हें राज्यसभा की सदस्यता प्राप्त हुई और संसद में पहुँच गए। 1955 में वह भारतीय वकीलों के शिष्टमंडल का नेतृत्व करते हुए सोवियत संघ भी गए। 1957 में उन्होंने यू. एन.ओ. में भारतीय शिष्टमंडल का नेतृत्व किया।


इसके बाद फ़ख़रुद्दीन अली असम विधानसभा में निर्वाचित हुए और इन्हें असम राज्य की बड़ी ज़िम्मेदारियाँ दी गईं। अपने कार्यकाल के दौरान इन्होंने वित्त, क़ानून और पंचायत विभागों को संभाला। 1962 में यह पुन: असम विधानसभा में पहुँचे और इन्हें मंत्रिमंडल में स्थान भी प्राप्त हुआ। लेकिन उन्होंने स्वैच्छिक आधार पर 'स्थानीय स्वायत्त सरकार' से त्यागपत्र दे दिया। 1964 में यह सोवियत संघ के निमंत्रण पर मॉस्को गए। वापसी में इन्होंने जापान और हांगकांग की यात्रा भी की। 1965 में वह मलेशिया के स्वाधीनता समारोह में भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित हुए।


 फ़ख़रुद्दीन अली अहमद श्रीमती इंदिरा गांधी के क़रीबी सहयोगी थे। 29 जनवरी 1966 को इन्हें संघीय मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने शामिल कर लिया। इन्हें सिंचाई एवं ऊर्जा मंत्रालय का कार्यभार कैबिनेट मंत्री के रूप में प्राप्त हुआ। इस प्रकार केन्द्रीय मंत्रिमंडल में मुस्लिम वर्ग के प्रतिनिधित्व में इज़ाफ़ा हुआ और असम राज्य का कोई व्यक्ति पहली बार केन्द्रीय मंत्री बनने में सफल रहा। यद्यपि राष्ट्रीय राजनीति के शीर्ष पर यह पण्डित नेहरू के समय में ही आ गए थे लेकिन उस समय यह सांसद नहीं थे और असम विधानसभा के प्रतिनिधि ही थे। जब इन्हें 'यूनियन कौंसिल ऑफ़ मिनिस्टर्स' में शामिल किया गया तो यह आवश्यक था कि इन्हें अगले छह माह में संसद के किसी भी सदन की सदस्यता दिलाई जाए। अत: अप्रैल 1966 में यह राज्यसभा में पहुंचे। इन्होंने शिक्षा मंत्री के रूप में भी 14 नवम्बर 1966 से 12 मार्च 1967 तक कार्य किया।


फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने असम राज्य की बारपेटा संसदीय सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा और विजयी हुए। 1967 में इस सफलता के बाद इन्हें केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शरीक करते हुए औद्योगिक विकास और कम्पनी मामलों का मंत्रालय सौंपा गया। 27 जून 1970 को जब केन्द्रीय मंत्रिमंडल में भारी फेरबदल किया गया तो इन्हें खाद्य एवं कृषि मंत्रालय मिला। 1971 के लोकसभा चुनाव में यह पुन: बारपेटा की सीट से निर्वाचित हुए। 3 जुलाई 1974 तक खाद्य कृषि मंत्री के रूप में इनकी सेवाएं जारी रहीं।


3 जुलाई 1974 को फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने केन्द्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री के रूप में अपना त्यागपत्र दे दिया। कांग्रेस पार्टी इन्हें अगले राष्ट्रपति चुनाव हेतु अपना प्रत्याशी बनाना चाहती थी। उस समय कांग्रेस बहुत मज़बूत स्थिति में थी और उसके प्रस्तावित उम्मीदवार का राष्ट्रपति बनना तय था। राष्ट्रपति चुनाव का परिणाम 20 अगस्त 1974 को घोषित हुआ। कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में इन्हें विजय प्राप्त हुई। तब इनके प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार त्रिदीप चौधरी थे, जिन्हें विपक्ष की आठ पार्टियों ने अपना उम्मीदवार बनाया था। फ़ख़रुद्दीन अली को डाले गए वोटों का 80 प्रतिशत मिला था।


इस चुनाव से पुन: साबित हुआ कि भारत की धर्मनिरपेक्षता सर्वोपरि है। इस प्रकार एक 'काज़ी' के पौत्र ने देश का सर्वोच्च पद प्राप्त किया। इनका राष्ट्रपति निर्वाचित होना विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों की जीत थी। इससे देश में साम्प्रदायिक सौहार्द बढ़ा और मुस्लिम वर्ग में बढ़ता असंतोष कम हुआ। राष्ट्रपति नियुक्त होने के समय यह लोक सभा के सदस्य भी थे, अत: उन्होंने 21 अगस्त 1974 लोक सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। 24 अगस्त 1974 को सुबह 9 बजे फ़ख़रुद्दीन अली ने भारत के पांचवें राष्ट्रपति के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ ग्रहण की। सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश श्री ए. एन. रे ने इन्हें उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं इनके साथियों की उपस्थिति में हिन्दी और अंग्रेजी भाषा में राष्ट्रपति भवन के दरबार हाल में शपथ ग्रहण कराई। 31 तोपों की सलामी के मध्य इन्होंने राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभाला।


1975 में सऊदी अरेबिया के तत्कालीन राजा फैसल के निधन पर फ़ख़रुद्दीन अली अहमद भारत सरकार के प्रतिनिधि की हैसियत से अंतिम संस्कार में उपस्थित हुए। यह भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के साथ उपस्थित हुए एकमात्र राष्ट्राध्यक्ष थे। बाकी राष्ट्रध्यक्ष मुस्लिम देशों के प्रतिनिधि के रूप में इस मौके पर उपस्थित हुए थे। राष्ट्रपति बनने के बाद यह हंगरी और यूगोस्लाविया की सरकारी यात्रा पर भी गए।


फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने देश में उर्दू को उचित सम्मान दिलाने के लिए विभिन्न स्तर कर कार्य किए। लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि कोई भी भाषा राष्ट्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा प्रचलित भाषा नहीं बनाई जा सकती, जबकि वह भाषा आम लोगों में प्रचलित न हो अथवा आम लोगों के संस्कारों में न हो। उस समय भाषा को लेकर जो आंदोलन किए जा रहे थे, उनके संबंध में फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने स्पष्ट चेतावनी दी कि भाषाओं को जबरन थोपना ठीक नहीं होगा। उन्होंने उर्दू भाषा को लेकर मुस्लिमों को भी सावधान किया कि मात्र उर्दू ही मुस्लिमों की भाषा नहीं है। किसी भी धर्म की कोई एक ही भाषा नहीं हो सकती।


 इंदिरा गांधी के क़रीबी

 श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ फ़ख़रुद्दीन अली अहमद के सदैव आत्मीय एवं पारिवारिक संबंध रहे। दोनों एक-दूसरे का हृदय से सम्मान करते थे। मंत्री से राष्ट्रपति बनने तक भी इन संबंधों में विश्वास और स्नेह बना रहा। श्रीमती इंदिरा गांधी के पारिवारिक समारोहों में भी वह शिरकत करते थे। इसी प्रकार फ़ख़रुद्दीन अली अहमद के परिवार में जन्म, मरण एवं वरण संबंधी अवसरों पर श्रीमती गांधी एक आत्मीय जन की भांति उपस्थित रहती थीं। श्रीमती इंदिरा गांधी के पोते राहुल गांधी एवं प्रियंका गांधी के जन्मदिन समारोहों में भाग लेने जाते थे। इंदिरा गांधी इन्हें घर लाकर ईद के त्योहार की बधाई देती थी। इसी प्रकार श्रीमती इंदिरा गांधी के जन्मदिन पर वह अपनी बेगम के साथ इंदिरा गांधी के आवास पर बधाई देने जाते थे। राष्ट्रपति बनने के बाद भी उन्होंने इस क्रम में कोई व्यतिक्रम नहीं किया।


अंतिम समय

 6 फरवरी 1977 को फ़ख़रुद्दीन अली अहमद मलेशिया, फिलिपींस और बर्मा (वर्तमान म्यांमार) की राजकीय यात्रा पर गए। लेकिन इंडोनेशिया पहुंचने के बाद यह ख़राब स्वास्थ्य के कारण बर्मा और फिलिपींस की यात्राएं स्थगित करके 10 फरवरी 1977 को भारत लौट आए। 11 फरवरी 1977 की सुबह बाथरूम में हृदयाघात का दौरा पड़ने के कारण वह फर्श पर गिर पड़े। फिर प्रात: 8 बजकर 52 मिनट पर इनका निधन हो गया। इनकी मृत्यु के समय दो छोटी बहनें तथा पत्नी आबिदा बेगम ही इनके निकट थे। भाई, पुत्र, बेटी तथा अन्य लोग तब देश के बाहर थे लेकिन इनकी मृत्यु के बाद वे भारत पहुंच गए।


सम्मान

 राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद की स्मृति को शाश्वत रखने के उद्देश्य से भारत सरकार ने इनके चित्र से युक्त डाक टिकट जारी किया। बेशक इंसान सदैव के लिए संसार में नहीं रहता और एक दिन उसे शरीर त्यागना ही होता है तथापि फ़ख़रुद्दीन अली अहमद जैसे राष्ट्रभक्त कभी भी विस्मृत नहीं किए जा सकते। इनका नाम भारत के सच्चे सपूत के रूप में सदैव याद किया जाता रहेगा। यह भारत की धर्मनिरपेक्ष नीति के ज्वलंत और अनुकरणीय व्यक्तित्व के कारण भी हमेशा याद किए जाएंगे।