जलवायु परिवर्तन का व्यापक हल निकालने की जरूरत, पूर्वोत्तर राज्यों पर हो रहा है गंभीर असर

Daily news network Posted: 2018-03-31 15:23:21 IST Updated: 2018-03-31 18:16:17 IST
जलवायु परिवर्तन का व्यापक हल निकालने की जरूरत, पूर्वोत्तर राज्यों पर हो रहा है गंभीर असर
  • जलवायु परिवर्तन आज एक गंभीर मुद्दा बनकर पूरी दुनीया के सामने खड़ा है जिससे जुड़ी चुनौतियों के साथ अनुकूलन स्थापित करने के लिए भू-जलविज्ञानियों

गुवाहाटी

जलवायु परिवर्तन आज एक गंभीर मुद्दा बनकर पूरी दुनिया के सामने खड़ा है, जिससे जुड़ी चुनौतियों के साथ अनुकूलन स्थापित करने के लिए भू-जल वैज्ञानिकों, सरकारी एजेंसियों और स्थानीय समुदायों के बीच परस्पर समन्वय स्थापित करने और साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), इंदौर और आईआईटी, गुवाहाटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह बात उभरकर आई है।

 

देश के पूर्वोत्तर राज्यों में जलवायु परिवर्तन का बेहद ही गंभीर असर पड़ा है, जिससे हर साल बाढ़ और तूफान जैसे हालात पैदा होते हैं और लोगों को इसका खामियाजा अपनी जान और माल को गवा कर चुकाना पड़ता है।

 

 

 

अध्ययनकर्ताओं के आनुसार

 

 नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं, सलाहकारों, स्थानीय शिक्षाविदों, विकास एजेंसियों और किसानों के साक्षात्कार के आधार पर अध्ययनकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं। यह अध्ययन पूर्वोत्तर भारत के सिक्किम में किया गया है।

 

अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि भू-जलविज्ञानियों, सरकारी एजेंसियों और स्थानीय समुदायों के बीच बेहतर तालमेल को बढ़ावा देने की जरूरत है। ऐसा करने से जलवायु परिवर्तन से संबंधित सूखे एवं बाढ़ जैसी चरम स्थितियों और जल सुरक्षा के बारे में समझ विकसित करने और उससे निपटने लिए प्रभावी रणनीति तैयार करने में मदद मिल सकती है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा अनुदान प्राप्त यह अध्ययन शोध पत्रिका साइंस ऑफ दि टोटल एन्वायरमेंट में प्रकाशित किया गया है। अध्ययनकर्ताओं की टीम में डॉ. मनीष गोयल के अलावा आईआईटी, गुवाहाटी के शोधकर्ता अदानी अझोनी शामिल थे।

 


 2030 तक भुगतने होंगे गंभीर परिणाम


पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा जारी एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि 2030 तक देश को जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। 'भारत पर जलवायु परिवर्तन का असर' नामक एक रिपोर्ट पूर्व पर्यावरण और वन राज्य मंत्री जयराम रमेश, पूर्व प्रोद्यौगिकी मंत्री कपिल सिब्बल और जाने-माने वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन ने जारी की थी। इस रिपोर्ट में भारत के हिमालय, पश्चिमी घाट, तटवर्ती क्षेत्र और पूर्वोत्तर क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि, पानी, स्वास्थ्य और वन क्षेत्रों पर वर्ष 2030 तक पड़ने वाले असर का अध्ययन किया गया है। इसके अनुसार 2030 तक सभी क्षेत्रों में तापमान में वृद्धि होगी।

 


साथ मिलकर करने होंगे उपाय

 विशेषज्ञों का कहना है कि इन उपायों से जलवायु परिवर्तन के कुप्रभावों पर पूरी तरह अंकुश लगाना भले संभव नहीं हो, लेकिन उन्हें काफी हद तक कम जरूर किया जा सकता है, इसी तरह कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए हरित उर्जा पर निर्भरता बढ़ानी होगी। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ ने उसके असर के अध्ययन और उस पर अंकुश लगाने के लिए एसएपीसीसी ने फिलहाल राज्य में छह इलाकों पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया है। इनमें रोजी-रोटी की निरंतर उपलब्धता के अलावा प्राकृतिक आपदा, स्वास्थ्य, जल संसाधन, शहरी योजना और उर्जा शामिल हैं। जोहरी कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन से दो तरीकों से निपटा जा सकता है पहला है एडॉप्शन यानी रूपातंरण- इसका मतलब है कि अगर जलवायु परिवर्तन हो रहा है तो इससे निपटने के लिए हमें क्या करना होगा। दूसरा तरीका है मिटीगेशन यानी शमन- इसका मतलब जलवायु परिवर्तन की वजहों को दूर करने का प्रयास करना है। वृक्षारोपण इसका सबसे बेहतर तरीका है।