क्या वामपंथी किले को ध्वस्त कर पाएगी बीजेपी, जानिए त्रिपुरा में क्यों हुई इतनी मजबूत

Daily news network Posted: 2018-02-14 15:35:43 IST Updated: 2018-02-17 12:31:28 IST
क्या वामपंथी किले को ध्वस्त कर पाएगी बीजेपी, जानिए त्रिपुरा में क्यों हुई इतनी मजबूत
  • पूर्वोत्तर के राज्य त्रिपुरा में चुनावी सरगर्मियां जोरों पर हैं जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे राज्य में पार्टियों के बीच सियासी

अगरतला

पूर्वोत्तर के राज्य त्रिपुरा में चुनावी सरगर्मियां जोरों पर हैं जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे राज्य में पार्टियों के बीच सियासी पारा चढ़ता जा रहा है, सभी पार्टियां जोड़ तोड़ की राजनीति  में जुटी हुई हैं और जनता को अपने पक्ष में करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाह रही हैं।

 

 

 



2018 का नार्थईस्ट चुनाव कई मायनों में बेहद खास है क्योंकि चुनावी पटल पर जमानत दर्ज पार्टी भाजपा बेहद ही उग्र मूड में नजर आ रही है तो वहीं कांग्रेस कहीं दिखाई नहीं दे रही है बात करें अगर त्रिपुरा की तो यहां वामपंथी माकपा की सरकार है और उसको टक्कर देने के लिए बीजेपी मोदी की अगुवाई में राज्य में जोरदार तरीके से प्रचार प्रसार में जुटी हुई है।

 



आपको बता दें कि उत्तर-पूर्व के 5 राज्यों में बीजेपी के नेतृत्व वाला नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (एनईडीए) सत्ता में है इन 5 राज्यों में से 3 में बीजेपी की सरकारें हैं। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने राज्य की जनजातीय पार्टी इंडीजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के साथ भी गठबंधन किया है।

 

 


वहीं इंडीजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा के विभाजित गुट आईपीएफटी-तिपराहा के सभी प्रमुख नेता 1 फरवरी को बीजेपी में शामिल हो चुके हैं हालांकि, उनमें से कोई भी नेता चुनाव नहीं लड़ रहा है. लिहाजा यह स्पष्ट हो गया है कि, त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इस बार विपक्षी दलों का नेतृत्व नेडा (एनईडीए) नहीं बल्कि बीजेपी कर रही है. ऐसा इसलिए, क्योंकि नेडा में शामिल होने को लेकर राज्य की किसी भी जनजातीय पार्टी की स्थिति साफ नहीं है।

 

 

 

 

 नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस यानी 'नेडा' का गठन मई 2016 में हुआ था, नेडा के गठन का मकसद पूर्वोत्तर के राज्यों के सामूहिक हितों की रक्षा और क्षेत्र में गैर-कांग्रेसी दलों को एकजुट करना था जबकि आईपीएफटी और इंडीजिनस नेशनलिस्ट पार्टी ऑफ त्रिपुरा (आईएनपीटी) के नेताओं ने दावा किया है कि, राज्य की कोई भी जनजातीय राजनीतिक पार्टी नेडा की सदस्य नहीं है, असम के वित्त मंत्री और नेडा के संयोजक हेमंत बिस्वा सरमा ने भी उनके दावे पर मुहर लगाई है।


 त्रिपुरा की दोनों ही मुख्य जनजातीय पार्टियां आईपीएफटी और आईएनपीटी अरसे से अलग राज्य की मांग कर रही हैं. राज्य में सत्तारूढ़ सीपीएम के सामने दोनों ही पार्टियां दशकों से विपक्ष की भूमिका निभाती आ रही हैं।


 



तो वहीं बीजेपी नेताओं का कहना है कि त्रिपुरा की लड़ाई के लिए पार्टी के चुनावी इतिहास में अभूतपूर्व प्रयोग किया जा चुका है। पार्टी एक साल से कैडर आधारित संगठन के निर्माण का विशाल कार्य कर रही हैं, ताकि सीपीआई(एम) और लेफ्ट फ्रंट पार्टियों की सेना से मुकाबला किया जा सके। करीब पचास हजार बीजेपी और आरएसएस कार्यकर्ताओं, प्रशिक्षकों और विशेषज्ञों को इसका हिस्सा बनाया गया है। जो कि देश के अलग-अलग भागों से इसमें शामिल हुए हैं।  इसे लेकर बीजेपी के त्रिपुरा प्रभारी सुनील देवधर ने कहा कि इस सेना को कम्युनिस्ट्स के साथ लड़ने और त्रिपुरा जीतने के लिए तैयार किया गया है अब हमारे पास युवा मोर्चा, महिला मोर्चा और एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों और किसानों के लिए भी मोर्चा है। इन मोर्चों को पहले मंडल स्तर पर सेट किया गया। इसके बाद इन्हें जिला और फिर राज्य स्तर पर सेट किया गया। हम जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं और मतदाताओं से जुड़ने में कामयाब रहे हैं। इन मोर्चों को पिछले साल जनवरी में तैयार किया गया था जो कि अब बहुत मजबूत हो गया है।”



 इसके साथ ही त्रिपुरा में अमित शाह ने कहा कि "त्रिपुरा में गैर वाम मतों को विभाजित कर कांग्रेस एक तरह से सत्तारूढ़ मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की मदद कर रही है. हालांकि यह भाजपा को अगले सप्ताह के बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में राज्य की सत्ता में आने से नहीं रोक सकेगा." शाह के अब तक की रणनीति से पता चलता है कि त्रिपुरा में 'लाल दुर्ग' ढहाने के लिए बीजेपी ने अपने चुनावी इतिहास में बिल्कुल नए प्रयोग कर रही है।

 

इसके साथ ही बीजेपी ने शक्ति केंद्र विस्तारकों को भी नियुक्त किया है जिनमें से एक विस्तारक प्रत्येक पांच पोलिंग बूथ का चार्ज संभाल रहा है। देवधर ने कहा “त्रिपुरा में 3,400 बूथ हैं जिसके लिए 600 शक्ति केंद्र विस्तारक हैं। इनमें से ज्यादातर असम से हैं। इनका कार्य यह सुनिश्चित करना है कि पार्टी तेलयुक्त मशीन की तरह अच्छे से चल रही है।” बीजेपी नेता ने कहा “हमारे लिए कांग्रेस मतदाताओं को अपनी तरफ करना कोई मुश्किल कार्य नहीं था क्योंकि कई सालों से कांग्रेस हाई कमांड इन्हें नजरअंदार करती आ रही थी।” उन्होंने कहा कि बीजेपी कार्यकर्ताओं ने सीपीआई(एम) मतदाताओं से संपर्क किया है। इतना ही नहीं कई सीपीआई (एम) कार्यकर्ता भी अपनी पार्टी से खफा हैं।