अनुच्छेद 370 के हटने का इन राज्यों में हुआ कड़ा विरोध, भाजपा की सहयोगी पार्टी ने खोला मोर्चा

Daily news network Posted: 2019-08-06 12:27:11 IST Updated: 2019-08-06 12:27:11 IST
अनुच्छेद 370 के हटने का इन राज्यों में हुआ कड़ा विरोध, भाजपा की सहयोगी पार्टी ने खोला मोर्चा

आइजोल

पूर्वोत्तर राज्यों के जनजातीय समुदायों के नेताओं ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल का विरोध किया है। क्षेत्रीय नेताओं में पूर्वोत्तर राज्यों को अनुच्छेद 371 के तहत मिलने वाले विशेष दर्जे को लेकर चिंता शुरू हो गई हैं। त्रिपुरा की बीजेपी सरकार में सहयोगी आईपीएफटी के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने सड़क पर उतर कर बिल के विरोध में  प्रदर्शन किया। असम को छोडकर त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और अरुणाचल राज्यों में विभिन्न जनजातीय समुदायों के नेता बिल के विरोध में बयान दे रहे हैं। बता दें कि पूर्वोत्तर राज्यों को भी कई विशेषाधिकार मिले हैं। 

 


आर्टिकल 371A

संविधान के इस प्रावधान से ऐसे किसी भी व्यक्ति को नागालैंड में जमीन खरीदने की इजाजत नहीं है जो वहां का स्थायी नागरिक नहीं हो। यहां जमीनें सिर्फ राज्य के आदिवासी ही खरीद सकते हैं। 

 


आर्टिकल 371F 

भारतीय संघ में सबसे आखिर में साल 1975 में शामिल हुए सिक्कम को भी संविधान में कई अधिकार हैं। आर्टिकल 371F ने राज्य सरकार को पूरे राज्य की जमीन का अधिकार दिया है, चाहे वह जमीन भारत में विलय से पहले किसी की निजी जमीन ही क्यों न रही हो। दिलचस्प बात यह है कि इसी प्रावधान से सिक्कम की विधानसभा चार साल की रखी गई है जबकि इसका उल्लंघन साफ देखने को मिलता है। यहां हर 5 साल में ही चुनाव होते हैं। यही नहीं, आर्टिकल 371F में यह भी कहा गया है, 'किसी भी विवाद या किसी दूसरे मामले में जो सिक्किम से जुड़े किसी समझौते, एन्गेजमेंट, ट्रीटी या ऐसे किसी इन्स्ट्रुमेंट के कारण पैदा हुआ हो, उसमें न ही सुप्रीम कोर्ट और न किसी और कोर्ट का अधिकारक्षेत्र होगा।' हालांकि, जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति के दखल की इजाजत है। 



 आर्टिकल 371G 

इस आर्टिकल के तहत मिजोरम में भी सिर्फ वहां के आदिवासी ही जमीन के मालिक हो सकते हैं। हालांकि, यहां प्राइवेट सेक्टर के उद्योग खोलने के लिए राज्य सरकार मिजोरम (भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्स्थापन) ऐक्ट 2016 के तहत भूमि अधिग्रहण कर सकती है। आर्टिकल 371A और 371G के तहत संसद के आदिवासी धार्मिक कानूनों, रिवाजों और न्याय व्यवस्था में दखल देने वाले कानून लागू करने के अधिकार सीमित हैं।