सुअर पालन पर सबसे बड़े धार्मिक संस्थान ने एक 'परिवार' को किया निष्कासित

Daily news network Posted: 2019-05-20 14:00:08 IST Updated: 2019-05-20 18:34:25 IST
सुअर पालन पर सबसे बड़े धार्मिक संस्थान ने एक 'परिवार' को किया निष्कासित
  • श्रीमंता शंकरदेव संघ असम की एक संस्था है जिसके तीस लाख से भी ज्यादा अनुयायी हैं। यह असम में सबसे बड़ी और मजबूत संस्था के रूप में जानी जाती है, उस वक्त एक बड़े विवाद में फंस गई जब उसके अपने एक दल ने एक परिवार को सुअर के फार्म को व्यवसाय के तौर पर संचालन करने के चलते बैन कर दिया।

श्रीमंता शंकरदेव संघ असम की एक संस्था है जिसके तीस लाख से भी ज्यादा अनुयायी हैं। यह असम में सबसे बड़ी और मजबूत संस्था के रूप में जानी जाती है, उस वक्त एक बड़े विवाद में फंस गई जब उसके अपने एक दल ने एक परिवार को सुअर के फार्म को व्यवसाय के तौर पर संचालन करने के चलते बैन कर दिया।

 

बिस्वानाथ जिले के एक एसएसएस यूनिट ने गुरुवार को अपने एक साथी बलेंद्रनाथ को लिखते हुए सूचित किया कि उनके परिवार को संस्था से बाहर कर दिया गया है क्योंकि उनके 23 वर्षीय पुत्र इंद्रजीत ने नौकरी छोड़ने के बाद कई महीने पहले शहर के बाहर सुअर का व्यवसाय शुरू किया है।

 


 वहीं दूसरी ओर नाथ ने कहा कि यूनिट के इस निर्णय से हमें धक्का लगा है, उन्होंने कहा कि हमारे परिवार को सच्चाई और ईमानदारी के साथ खाने की सजा मिली है। उन्होंने कहा कि संस्थान के इस फैसले ने हमें हमारे ही गांव से दूर कर दिया है। नाथ ने कहा कि वो चिंतित हैं क्योंकि संस्थान के इस फैसले के चलते उनको और उनके परिवार को गांव और समाज से दूर कर दिया जाएगा। बता दें कि इंद्रजीत ने 2017 में स्नातक कर लिया था जिसके बाद उसने लगभग नौ महीने तक बेंगलुरू में गार्ड की नौकरी की और उसके बाद असम लौट कर अपना काम शुरू किया।

 



ज्ञात हो कि गैर-आदिवासी असमी, खासकर नाथ परिवार की बहुसंख्यक आबादी के बीच सुअरों का पालन-पोषण आम नहीं है, क्योंकि सुअरों को अस्वच्छ माना जाता है। लेकिन कुछ समुदायों के बीच में कुछ दशक पहले तक सुअर का मांस काफी प्रचलित था और खाया भी जाता था, और वर्तमान की बात करें तो सुअर का मांस तेजी से लोकप्रियता की ओर बढ़ता जा रहा है, खासकर युवाओं में। 



 आपको बता दें कि उत्तर-पूर्व में हर साल तीन लाख टन पोर्क की खपत होती है, जिसमें से केवल 1.3 लाख टन का उत्पादन यह राज्य खुद करता है। बांकी का यह देश के अन्य हिस्सों से आयात कराता है। वहीं अगर पूरे भारत की बात की जाए तो सलाना 4.6 लाख टन पोर्क का उत्पादन होता है जिसमें से लगभग दो-तिहाई तो उत्तर-पूर्वी राज्यों में ही किया जाता है, लेकिन असम में बहुसंख्यक आबादी के सदस्यों जैसे कि बालेंद्र नाथ और उनके परिवार के लिए, एक सुअर का काम शुरू करना न तो आसान है और न ही प्रेरणा से भरा है क्योंकि सुअरों को अस्वच्छ माना जाता है।

 


 हो सकता है इंद्रजीत नार्थ ईस्ट प्रोग्रेसिव पिग फार्मर्स ऐसोसिएशन से प्रेरित हुए हो। लगभग एक साल पुराना ये मंच असम में बेरोजगारी और पिग के व्यवसाय के जरिए किसानों को एक साथ लाने के लिए वैज्ञानिक प्रशिक्षण देने का काम काम करता है। बता दें कि एनईपीपीएफए में असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और नागालैंड सहित अन्य राज्यों से करीब दो सौं से ज्यादा सदस्य जुड़े हुए हैं।

  


 एनईपीपीएफए के अध्यक्ष, मनोज कुमार बोसुमाराति कहते हैं कि संघ को इस तरह का निर्णय लेने का अधिकार केवल तभी है जब उनके पास हमारे युवाओं में स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए बेहतर विचार हों जो उन्हें आर्थिक रूप से सुरक्षित बनाता है, नहीं तो उन्हें अपना मुंह बन्द कर लेना चाहिए और रोजगार के लिए युवा जो कर रहे है उन्हें करने देना चाहिए। एसएसएस संस्था के सदस्य बताते हैं कि एसएसएस उन्हें चिकन खाने की अनुमति तो देता है लेकिन पिग के लिए सख्त तौर पर ना है।