असम के ढाई लाख मुसलमानों की शिनाख्त,हो सकते हैं रोहिंग्या जैसे हालात

Daily news network Posted: 2018-04-02 16:34:34 IST Updated: 2018-04-02 17:02:26 IST
असम के ढाई लाख मुसलमानों की शिनाख्त,हो सकते हैं रोहिंग्या जैसे हालात
  • ऊपरी असम के करीब ढ़ाई लाख मुसि्लमों की नागरिकता जाने का खतरा है। दरअसल वे अब तक वे दस्तावेजों को जमा करवाने में नाकाम रहे हैं

गुवाहाटी

ऊपरी असम के करीब ढ़ाई लाख मुसि्लमों की नागरिकता जाने का खतरा है। दरअसल वे अब तक वे दस्तावेजों को जमा करवाने में नाकाम रहे हैं कि, 1971 से पहले के उनके परिवार भारत में रहता था कि नहीं। बता दें कि असम सरकार के नागरिक की राष्ट्रिय रजिस्टर (एनआरसी) में शामिल होने वालों की पहली सूचि प्रकाशित करने की तैयारी में जुटी है।

 

 



अधिकारियों का कहना है कि छह दशकों में पहली बार हुई इस प्रक्रिया का मकसद बांग्लादेशियों की पहचान करके उन्हें देश से बहार निकालना है हालांकि आलोचकों का ऐसा कहना है कि यह प्रक्रिया मुसलमान नागरिकों को बांग्लादेशी बताकर उन्हें लम्बे समय के लिए शरणार्थियों बनाने की धमकी दी जा रही है जिससे उनके भी हालात रोहिंग्या मुसलमानों की तरह हो जायेंगे।

 



असम में 32 मिलियन की आबादी है जिसमें से एक तिहाई ममुसलमान हैं, एनआरसी से जुड़े ताक हाजेला ने बताया कि असम में 4.8 मिलियन लोगों ने पहली सूचि के प्रकाशन में अग्रिम रूप से उचित विरासत दस्तावेजों को जमा कराने में नाकाम रहे हैं. असम में सत्ता में प्रकधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिन्दू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी ने 2016 में एनआरसी में शामिल नहीं होने वाले लोगों को देश से निकालने की कसम खाई है.


 


क्या कहना है हिमंता बिस्वा सरमा का


असम के वित्त और स्वस्थ्य मंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बुधवार को संवाददाताओ से बातचीत करते हुए कहा कि जिन लोगों के नाम एनआरसी में शामिल नहीं है, उन्हें देश से निकाला जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पहली सूची में प्रकाशन से पहले स्थानीय सरकार ने सीमावर्ती राज्य में 40  हजार से अधिक पुलिस अफसरों और अर्धसैनिक को जुटा लिया है. जिससे राज्य में किसी भी संभावनाओं से निपटा जा सके. हालांकि बांग्लादेशी मूल के हिन्दू लोगों को भारत में रहने की इजाजत दी जाएगी। उन्होंने कहा कि हिन्दुओं को अपने घर के देशों में उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है.


1970 के दशक की शुरुआत हजारों शरणार्थी बड़ी संख्या में हिन्दू और मुस्लिम बांग्लादेश से असम आ गए. और 1980 के दशक में विरोधी आप्रवासी प्रदर्शन में सैकड़ों लोग मारें गए थे, जिसके परिणामस्वरूप सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच 1985 में समझौता हुआ था कि, जिन्होंने 24 मार्च 1971 के बाद दस्तावेजों के बिना राज्य में प्रवेश किया है वह विदेशी कहलाये जायेंगे। और एनआरसी में शामिल होने और भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के लिए उन्हें इस तिथि से पहले के दस्तावेज सरकार को देने पड़ेंगे कि वे या उनका परिवार भारत के नागरिक हैं या नहीं।


 कोई बहाना नहीं


यह पूरी प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायलय की देख रेख में की जा रही है, जिसे आखिरी तारीख 30 जून से पहले प्रकाशित करने का आदेश दिया गया है, अदालत ने असम की सरकार को सत्यापन प्रक्रिया पूरी करने के लिए 30 जून का समय सीमा दी है हालांकि फरवरी में असम सरकार ने इस काम को इतने समय में पूरा करना असंभव बताते हुए अदालत से अनुरोध किया था कि तय समय सीमा को आगे बढ़ा दिया जाये। जिसे अदालत ने अस्वीकार कर दिया है और साथ ही यह भी कहा है कि सरकार का काम असंभव को संभव बनाना ही है. इसके साथ ही न्यायाधीशों ने सत्यापन प्रक्रिया में सहायता करने के लिए एक दूसरे समन्वयक की नियुक्ति से भी इंकार कर दिया है,इसके साथ ही एनआरसी प्रक्रिया को प्रभावित किये बिना कोर्ट ने असम सरकार को स्थानीय परिषद् चुनावों को भी आयोजित करने का भी आदेश दिया है.


मुश्किल प्रक्रिया


प्रतिक हजेला ने एनआरसी की सत्यापन प्रक्रिया को बेहद मुश्किलन भरा काम बताया है उन्होंने कहा कि सत्यापन प्रक्रिया के दौरान पारिवारिक ट्री को बेमेल देखा गया है और उसमें लोगों को सत्यापन के लिए बुलाया जाना एक जटिल प्रक्रिया है क्योंकि परिवार के सभी लोग एक स्थान पर मौजूद नहीं है जिससे यह प्रक्रिया और भी मुश्किल भरी हो गयी है क्योंकि हमें यह सुनिश्चित करना है की सत्यापन से जुड़े सभी लोग अधिकारीयों के समक्ष मौजूद हों.