इस लेखिका का दावा, राजीव गांधी ने दूषित की असम की राजनीति

Daily news network Posted: 2019-08-19 10:12:11 IST Updated: 2019-08-19 10:43:20 IST
इस लेखिका का दावा, राजीव गांधी ने दूषित की असम की राजनीति
  • संगीता बरुआ पिशरोती ने अपनी पुस्तक ‘‘असम: द अकॉर्ड, द डिस्कॉर्ड’’ में कई तथ्यों को सबके सामने रखने की कोशिश की है।

गुवाहाटी

संगीता बरुआ पिशरोती ने अपनी पुस्तक ‘‘असम: द अकॉर्ड, द डिस्कॉर्ड’’ में कई तथ्यों को सबके सामने रखने की कोशिश की है। जिनमें से एक है 1985 का असम समझौता। उनका का कहना है कि 1985 के असम समझौते से राज्य में स्थायी शांति नहीं आयी और ऐसा लगता है कि इससे केवल असहमति और मतभेद उत्पन्न हुए। यह दावा उनकी एक नई पुस्तक में किया गया है। संगीता बरुआ पिशरोती ने अपनी पुस्तक ‘‘असम: द अकॉर्ड, द डिस्कॉर्ड’’ में दावा किया है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और असम आंदोलन के नेताओं के बीच हुए समझौते ने राज्य की राजनीति को दूषित किया और उग्रवाद को भी बढ़ावा दिया।

 


तथ्य प्रस्तुत करने का प्रयास

पिशरोती का मानना है कि आम लोग अजीब स्थिति में फंसे थे, उन्हें नहीं पता कि कौन शत्रु है, कौन मित्र। असम की कहानी बहुत पुरानी है जिसमें हर एक व्यक्ति समय के साथ एकदूसरे की नजर में पीड़ित और अपराधी बना। पिशरोती का कहना है कि उन्होंने ‘‘जितना संभव हो उनके तथ्य प्रस्तुत करने का प्रयास किया है जिससे रुचि रखने वाला पाठक असम की कहानी की जटिलताओं को समझ सके।

 


इन बिंदुओं पर जताया दुख

वो आगे कहती हैं कि मुझे इसका दुख है कि भारत में मुख्यधारा के आख्यान में असम शायद ही कभी शामिल हुआ हो, खासकर जब दो महत्वपूर्ण घटनाक्रमों विभाजन और आपातकाल की बात होती है जिसने आधुनिक भारतीय राजशासन के निर्माण को परिभाषित किया है। उन्होंने कहा, दोनों घटनाओं की लोगों और असम की राजनीति को आकार देने में बड़ी भूमिका थी जितना इसके बारे में स्वीकार किया जाता है। शायद असम आंदोलन को आपातकाल से उभरा राजनीति का अंकुर कहना पूरी तरह से गलत नहीं होगा। देश बांग्लादेश के निर्माण को लेकर खुश था और यह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मुकुट में रत्न बना, लेकिन सीमापार से शरणार्थियों के पलायन ने पुरानी ऐतिहासिक आशंकाओं को ताजा कर दिया और असम में व्यापक अशांति उत्पन्न की, जिस पर मुख्यधारा के भारत में ध्यान नहीं दिया गया।

 

 

 

इन विषयों पर भी की चर्चा

ज्ञात हो कि अवैध प्रवासियों की पहचान करने और उन्हें वापस भेजने की मांग को लेकर छह वर्ष का आंदोलन संगठन एएएसयू द्वारा 1979 में किया गया था। इसकी समाप्ति राजीव गांधी की मौजूदगी में 15 अगस्त 1985 में असम समझौते के हस्ताक्षर के साथ हुई थी। पुस्तक में भाषाई आंदोलन, राष्ट्रीय नागरिक पंजी, नागरिकता विधेयक के साथ ही असम में भाजपा के बढ़ने और 1916 में सत्ता में आने जैसे विषयों पर भी चर्चा की गई है।