चुनाव के बीच फंसी इस राज्य की सरकार, सामने आया ऐसा बड़ा सच

Daily news network Posted: 2019-04-26 08:44:41 IST Updated: 2019-04-26 10:17:24 IST
चुनाव के बीच फंसी इस राज्य की सरकार, सामने आया ऐसा बड़ा सच
  • इनर लाइन परमिट के मुद्दे पर राज्य सरकार पर चौतरफा दबाव बढ़ता जा रहा है।

शिलांग

इनर लाइन परमिट के मुद्दे पर राज्य सरकार पर चौतरफा दबाव बढ़ता जा रहा है। नवगठित अखिल खासी हिल्स अचिक फेडरेशन ने राज्य में आईएलपी प्रणाली के कर्यान्वयन की मांग के लिए आंदोलन संगठनों का पूर्ण समर्थन देने का फैसला किया है। फेडरेशन के महासचिव जाॅन डी संगमा ने एक बैठक के बाद आज यहां शहर में संवाददाताओं से बात करते हुए कहा कि वह सभी गैर- सरकारी संगठनों के साथ एकजुट होंगे ताकि राज्य सरकार पर स्वदेशी लोगों की सुरक्षा के लिए आईएलपी प्रणाली को तुरंत लागू किया जा सके।

 

 



उन्होंने बताया कि कन्फेडरेशन आॅफ मेघालय सोशल आर्गेनाइजेशन की तरह फेडरेशन ने भी मुख्यमंत्री कोरनाड के संगमा से आईएलपी मुद्दे पर अपना पक्ष रखने के लिए तुरंत मेघालय डेमोक्रेटिक एलायंस की बैठक बुलाने की मांग की है। फेडरेशन नेता संगमा का मानना है कि अवैध आव्रजन रोकने की दिशा में आईएलपी ही एकमात्र मजबूत तंत्र है। उन्होंने कहा कि राज्य भर में स्थापित किए जाने वाले प्रवेश-निकास बिंदुओं से अवैध आव्रजन पर अंकुश लगाने में मदद नहीं मिलेगी। इसलिए वह जल्द ही राज्य सरकार से मिलने के लिए जोर देंगे कि वे आईएलपी के कार्यन्वयन पर विचार करे।

 

 

 


 गत 30 मार्च को गठित फेडरेशन राज्य के विभिन्न मुद्दों को हल करने के उद्देश्य से गारो, खासी और जयंतिया जनजाति के बीच एकता को मजबूत करना चाहता है। एक अलग गारोलैंड राज्य के गठन की मांग के संबंध में फेडरेशन के रुख पर उनका कहना था कि गारो लोग जो खासी हिल्स क्षेत्र में रहते हैं, उनसे इस मुद्दे पर कभी भी परामर्श नहीं किया गया। हालांकि अगर भविष्य में वे करते हैं, तो वह चर्चा करेंगे तब इस मामले पर कुछ बात करेंगे। संगमा ने कहा कि राज्यवासियों के हित में उनका संघठन कार्य करेगा। फिलहाल उनके अनुसार दक्षिण पश्चिम खासी हिल्स जिले के अंतर्गत आने वाले गांव में लगभग 50,000 से अधिक गारो लोग रहते हैं।

 

 


 शिक्षा के क्षेत्र में सरकार द्वारा ठोस कदम न उठाने पर के लिए खिंचाई की। कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्र में आज भी स्कूली छात्रों के तमाम परेशानियों से रूबरू होना पड़ रहा है। यह शर्म की बात है कि बच्चों को अपने स्कूलों तक पहुंचने के लिए 10-20 किलोमीटर चलने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।