1.5 साल बाद साहेरा खातून को माना भारतीय, पढि़ए दर्द की दास्तां

Daily news network Posted: 2019-02-11 16:38:40 IST Updated: 2019-02-12 08:24:30 IST
1.5 साल बाद साहेरा खातून को माना भारतीय, पढि़ए दर्द की दास्तां

बारपेटा।

साहेरा खातून को 1.5 साल डिटेंशन कैंप में रहना पड़ा। इस दौरान उसे अपने परिवार व करीबी लोगों से दूर रहना पड़ा। 8 फरवरी को वह एक भारतीय के रूप में डिटेंशन कैंप से बाहर निकली। खातून बारपेटा जिले के मंडिया तहसील में स्थित बाघबार गांव की निवासी है। गुवाहाटी हाईकोर्ट के रेफरेंशियल ऑर्डर के बाद खातूून को रिहा किया गया। जब साहेरा अपने गांव पहुंची तो स्थानीय लोगों ने उसका जोरदार स्वागत किया और सरकार पर गैर जिम्मेदार और भारतीय को प्रताडि़त करने का आरोप लगाया।

 

 

 


साहेरा ने बताया कि यह मेरे और मेरे परिवार के लिए बड़ी राहत है। मैं ईश्वर को उनकी दया के लिए धन्यवाद देती हूं। पिछले कुछ माह में मुझे कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। मुझे खाने की दिक्कत आई। यह भयानक अनुभव था। पति कालू मियां और पांच बच्चों के नाम नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस के अंतिम प्रारुप में शामिल किए गए लेकिन खातून को विदेशी का टैग झेलना पड़ा।

 

 


बकौल खातून, मेरे माता पिता के नाम 1966 और 1971 की मतदाता सूचियों में शामिल थे। एक स्थानीय निवासी ने बताया कि कालू को पत्नी की कानूनी मदद के लिए 3 लाख रुपए का कर्ज लेना पड़ा। कालू पेशे से नाई है। साहेरा की गिरफ्तारी के बाद परिवार को सबसे बुरे वित्तीय संकट से गुजरना पड़ा। बच्चों की पढ़ाई पूरी नहीं हो पाई। बड़े बेटा गुवाहाटी शिफ्ट हो गया। वह वहां पर दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम

 करने लगा। कालू को हर माह 14 हजार रुपए के ब्याज के साथ कर्ज चुकाना पड़ा।

 

 


एक स्थानीय निवासी ने कहा कि कुछ गड़बडिय़ों के कारण उसके पूर्वजों के नाम मतदाता सूचियों में नहीं जोड़े गए। इस कारण भारतीय नागरिक होने के बावजूद उसे परेशानियां झेलनी पड़ी। आपको बता दें कि घुसपैठियों की पहचान के लिए असम में एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया चल रही है। एनआरसी में असम में रह रहे भारतीय नागरिकों के नाम शामिल किए जा रहे हैं। एनआरसी में शामिल होने के लिए असम में 3.29 करोड़ लोगों ने आवेदन किया था, जिसमें से 40.07 लाख आवेदकों को जगह नहीं मिली। एनआरसी से पता चलता है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं। इसमें जिनके नाम शामिल नहीं होते, उन्हें अवैध नागरिक माना जाता है। 25 मार्च 1971 से पहले असम में रह रहे लोगों को भारतीय नागरिक माना गया है।

 

 


 असम पहला राज्य है जहां भारतीय नागरिकों के नाम शामिल करने के लिए 1951 के बाद एनआरसी को अपडेट किया जा रहा है। एनआरसी का पहला मसौदा 31 दिसंबर और 1 जनवरी की रात जारी किया गया था, जिसमें 1.9 करोड़ लोगों के नाम थे। असम में बांग्लादेश से आए घुसपैठियों पर बवाल के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी को अपडेट करने को कहा था। पहला रजिस्टर 1951 में जारी हुआ था। ये रजिस्टर असम का निवासी होने का सर्टिफिकेट है। इस मसले पर असम में कई बड़े और हिंसक आंदोलन हुए हैं।

 

 

 

 


1979 में असम में घुसपैठियों के खिलाफ ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने आंदोलन किया। इसके बाद 1985 को तब की केन्द्र में राजीव गांधी सरकार ने असम गण परिषद से समझौत किया। इसके तहत 1971 से पहले जो भी बांग्लादेशी असम में घुसे हैं, उन्हें भारत की नागरिकता दी जाएगा। हालांकि इस पर काम शुरू नहीं हो सका। 2005 में जाकर कांग्रेस सरकार ने इस पर काम शुरू किया। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इसमें तेजी आई। इसके बाद असम में नागरिकों के सत्यापन का काम शुरू हुआ। राज्यभर में एनआरसी केन्द्र खोले गए। असम का नागरिक होने के लिए वहां के लोगों को दस्तावेज सौंपने थे।