डरे हुए हैं 90 लाख मुसलमान, जानिए क्यों ?

Daily news network Posted: 2018-07-11 12:54:01 IST Updated: 2018-07-30 11:03:21 IST
डरे हुए हैं 90 लाख मुसलमान, जानिए क्यों ?
  • असम में नागरिकता के नेशनल रजिस्टर को अपडेट करने की प्रक्रिया 30 जून तक पूरी नहीं हो पाई। इसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया को किसी भी हाल में 31 जुलाई तक पूरा करने को कहा है।

गुवाहाटी।

असम में नागरिकता के नेशनल रजिस्टर को अपडेट करने की प्रक्रिया 30 जून तक पूरी नहीं हो पाई। इसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया को किसी भी हाल में 31 जुलाई तक पूरा करने को कहा है। नेशनल रजिस्टर को अपडेट करने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही है। असम के भारतीय नागरिकों के नाम ड्राफ्ट रजिस्टर में प्रकाशित होने के साथ ही ये प्रक्रिया खत्म हो जाएगी।

 

इस प्रक्रिया  वजह से असम में रह रहे बंगाली बोलने वाले करीब 90 लाख मुस्लिमों के बीच डर का माहौल है। नागरिकता के राष्ट्रीय रजिस्टर की प्रक्रिया का संयोजन कर रहे अधिकारी डॉक्टर प्रदीप हजेला के हवाले से खबर आई थी कि असम में रह रहे करीब 48 लाख लोग अपने भारतीय नागरिक होने का सबूत देने में नाकाम रहे हैं। हालांकि हजेला ने इसका खंडन किया और उनके हवाले से खबर देने वाले रिपोर्टर के खिलाफ केस दर्ज करने की चेतावनी भी दी थी। हजेला ने कहा कि राज्य में अवैध रूप से रह रहे लोगों की संख्या महज 50 हजार के आस पास है।

 

आपको बता दें कि भारतीय नागरिकता का सबूत नहीं देने वालों को विदेशी घोषित कर दिया जाएगा। अब सवाल ये है कि उन लोगों का क्या होगा, जिन्हें विदेशी नागरिक घोषित किया जाएगा क्योंकि भारत और बांग्लादेश की सरकारों के बीच विदेशी बांग्लादेशी ठहराए गए लोगों को वापस भेजने का कोई समझौता नहीं है। सरकार की ओर से इस संबंध में अभी तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया है। असम में अवैध रूप से रह रहे विदेशियों की पहचान के लिए फॉरेनर्स ट्राईब्यूनल्स गठित किए गए हैं। इन ट्राईब्यूनल्स ने कई लोगों को विदेशी घोषित किया है।

 

इनमें औरतें भी शामिल है। विदेशी घोषित किए जाने वाले लोगों को राज्य के डिटेंशन सेंटर्स में रखा जाता है। इनमें से कई तो ऐसे हैं जो पिछले एक दशक से इन डिटेंशन सेंटर्स में बंद है। पिछले साल मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अल्पसंख्यकों का विशेष निरीक्षक नियुक्त किया गया था। मंदर का कहना है कि अपने सबसे पहले मिशन के तहत उन्होंने असम के डिटेंशन सेंटर्स के दौरे की इजाजत मांगी थी। वे 22 जनवरी से 24 जनवरी के बीच असम के दौरे पर गए थे। उन्होंने गोलपाड़ा और कोकराझार में बने डिटेंशन सेंटर्स का दौरा किया था।

 

उन्होंने वहां कैद लोगों से बातचीत भी की थी। इसके बाद उन्होंने एक रिपोर्ट तैयार की। बकौल हर्ष मंदर, न तो मानवाधिकार आयोग और न ही केन्द्र या राज्य सरकार ने उन्हें बताया कि उनकी रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई हुई। इसके बाद हर्ष मंदर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। मंदर ने सुझाव दिया था कि डिटेंशन सेंटर्स में कैद लोगों के हालात को सबसे पहले तो संविधान की धारा 21 और अंतरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से वैधानिकता के दायरे में लाने की व्यवस्था की जाए।

 

उन्हें आम अपराधियों के साथ जेल परिसर में बिना सुविधाओं और कानूनी नुमाइंदगी के कैद करके रखना, परिजनों से संवाद न करने देना, उनके सम्मान से जीने और कानूनी प्रक्रिया के अधिकार का उल्लंघन है। अंतरराष्ट्रीय कानून साफ कहता है कि अप्रवासियों को जेल में बंद करके नहीं रखा जा सकता। उन्हें अपराधी की तरह नहीं रखा जा सकता। मानवता के सिद्धांत और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक अवैध अप्रवासियों को उनके परिवारों से किसी भी सूरत में अलग नहीं किया जाना चाहिए।

 

इस नियम का मतलब ये है कि अवैध रूप से रह रहे लोगों को खुले नजरबंदी शिविरों में रखा जाना चाहिए न कि जेलों में कैद किया जाना चाहिए. ऐसे लोगों को अनिश्चिकाल के लिए कैद में रखना संविधान की धारा 21 और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों के पैमानों का उल्लंघन है।