ब्रह्मपुत्र नदी के बीचो बीच है उमानंद मंदिर, हजारों की संख्या में आते हैं श्रद्धालु

Daily news network Posted: 2018-04-18 18:25:40 IST Updated: 2018-05-09 14:17:03 IST
ब्रह्मपुत्र नदी के बीचो बीच है उमानंद मंदिर, हजारों की संख्या में आते हैं श्रद्धालु
  • गुवाहाटी के पास ब्रहमपुत्र के बीचो बीच एक छोटे से द्वीप की चोटी पर स्थिति है 'उमानंद' मंदिर जो असम के प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में से एक है और यही कारण है ...

गुवाहाटी के पास ब्रहमपुत्र के बीचो बीच एक छोटे से द्वीप की चोटी पर स्थिति है 'उमानंद' मंदिर जो असम के प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में से एक है और यही कारण है की यहां हज़ारों के संख्या में श्रद्धालु आते हैं और पूजा अर्चना करते है।



वर्ष 1694 में जब अहोम राजा ने इस मंदिर का निर्माण करवाया तब असम में कोई ब्रहमण परिवार निवास नहीं करता था। इसी लिए उत्तर प्रदेश के कन्नोज से दो परिवार आये थे और आज तक उन्हीं की पीढ़ी इस मंदिर का देख रेख करती है। मंदिर का नियम था कि पहाड़ पर किसी भी पुजारी का परिवार नही रहेगा और आज भी इस नियम का पालन किया जाता है। आज भी इस मंदिर में कुल 16 पुजारी हैं और सभी के परिवार यहां से 20 किलो मीटर दूर चान्ग्सारी में रहता है।



 मंदिर तक पहुंचने के लिए सब से पहले आप को 15 से 20 मिनट तक यात्रा नौका से तय करनी होगी। ब्रहमपुत्र के किनारे स्थित किसी भी घाट से नौकाएं आसानी से मिल जाती हैं। टापू तक पहुंचने के बाद सीढियां चढ़ने के बाद आप पहुंच जाएंगे उमानंद मंदिर के परिसर में पहाड़ी के पास नौका से उतरते ही आप को एक प्रवेश द्वार मिलेगा। द्वार के दोनों ओर बैठे हैं नंदी। परवेश द्वार से चोटी तक पहुंचने के लिए सीढियां बनी हुई हैं। सीढियां चढ़ते हुए जब आप आधी ऊंचाई पार कर लेंगे तब आप को पूजा सामग्री खरीदने के लिए कुछ दुकाने मिलेंगी और एक छोटा सा होटल जहां अक्सर लोग सुस्ताने और पानी पीने के बाद आगे बढ़ते हैं। फिर कुछ सीढियां चढ़ने के बाद आप को उजले रंग का उमानंद मंदिर का परवेश द्वार मिल जाएगा जहां प्रवेश कर आप मंदिर परिसर में पहुंच जाएंगे।



 मंदिर परिसर में दाखिल होने पर सब से पहले टिन के छत वाला एक छोटा सा झोंपड़ी नुमा गणेश मंदिर मिलता है। भक्त पहले वहां माथा टेकने के बाद ही उमानंद मंदिर की ओर बढ़ते हैं। उमानंद मंदिर में दाखिल होते ही मुख्य गर्भ ग्रह से सटे एक बड़े हॉल के बीचों बीच विराजमान हैं ब्रह्मा और विष्णु, ब्रह्मा और विष्णु की पूजा करने के बाद आगे बढ़ने पर मंदिर का मुख गर्भ ग्रह मिलता है जिस के द्वार के दोनों ओर राधे श्याम लिखा हुआ है और ऊपर कांसे के पतरी पर भगवन शिव की खुदी हुई तस्वीर लगी हुई है। यहां से आप मुख्य गर्भ ग्रह में प्रवेश  करते हैं।



 गर्भ ग्रह के अंदर अखंड दीप जल रहा है जिस में रोजाना एक लीटर तेल जलता है। यह दीप उस दिन से जल रहा है जब से इस मंदिर का निर्माण हुआ था। मंदिर के पुजारी बताते हैं की द्वापर युग में गुवाहाटी को प्रागज्योतिष पुर के नाम से जाना जाता था। उस समय ब्रहमपुत्र इस पहाड़ी के उत्तर की ओर से बहता था। दाहनी ओर एक सौदागर रहता था जिस के पास बहुत सारे जानवर थे। उन्हीं जानवरों में एक कामधेनु भैंस हमेशा दूध देने के लिए इस पहाड़ पर चली आती थी। जब सौदागर ने उसका पीछा किया तब देखा की वह एक बेल के पेड़ के नीचे दूध देती है। सौदागर ने उस स्थान की खुदाई की तो वहां शिवलिंग दिखाई दिया। उसी रात सौदागर के सपने में भगवान शिव ने दर्शन दिए और वहाँ मंदिर बनाने का आदेश दिया।



 और उसी रात भारी भूकंप से ब्रहमपुत्र का बहाव दो भाग में बंट गया और वोह पहाड़ी ब्रहमपुत्र के बीचोबीच एक टापू की शक्ल में रह गया। जब नदी में पानी कम हुआ तब सौदागर वहां आया और एक मंदिर का निर्माण करवाया। उस के बाद समय के साथ साथ मंदिर बनते रहे और टूटते रहे लेकिन फिर भी वहां उमानंद मंदिर खड़ा है।



यूं तो आज की युवा पीढ़ी धर्म से काफी दूर होती जा रही है। लेकिन उमानंद में आने से आप का यह ख्याल बदल जाएगा। अच्छे पती पत्नी की तमन्ना लिए युवा जोड़ियां यहां काफी संख्या में आते हैं। कहा जाता है की इस दिन मांगने वालों की हर मनोकामना भोले बाबा पूरी करते हैं।