गंगटोक: सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय और सिक्किम राज्य द्वारा अन्य राज्यों द्वारा अपने  राज्य की लॉटरी पर प्रतिबंध लगाने के फैसले के खिलाफ दायर एक मुकदमे पर सुनवाई की। मुकदमे का संदर्भ यह है कि लॉटरी (विनियमन) अधिनियम 1998 की धारा 5 के अनुसार, केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को किसी अन्य राज्य द्वारा आयोजित संचालित या प्रचारित लॉटरी के टिकटों की बिक्री पर रोक लगाने के लिए अधिकृत किया है। मेघालय राज्य ने यह कहा कि अन्य राज्यों द्वारा आयोजित लॉटरी का विनियमन राज्य का विषय नहीं है, लेकिन केंद्र सरकार के क्षेत्र में आता है, इस प्रकार अन्य राज्यों में लॉटरी बेचने की अनुमति देने की मांग की गई। सिक्किम ने मेघालय का समर्थन किया।

सिक्किम राज्य की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट एएम सिंघवी ने रेखांकित किया कि एक संघीय राष्ट्र में एक राज्य को दूसरे राज्य को अपने राज्य में लॉटरी बेचने पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि हमारा केवल एक ही सवाल है। यह कैसे संभव है कि भारत में एक भारतीय संघीय राज्य दूसरे राज्य के लिए एक राज्य द्वारा आयोजित लॉटरी पर प्रतिबंध लगा सकता है? मुझे अभी तक यह समझ में नहीं आया है कि मेरा राज्य अपने राज्य को कैसे प्रतिबंधित कर सकता है?

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मेघालय राज्य की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने इस मुद्दे पर कहा कि कल हर राज्य एक देश बन जाएगा और कहेगा कि मैं एक राज्य में दूध आने पर प्रतिबंध लगा दूंगा या मैं राज्य में रोजगार पर प्रतिबंध लगा दूंगा। ऐसा नहीं हो सकता! अधिनियम में ही "राज्य संगठित लॉटरी" क्या हैं और "राज्य अधिकृत लॉटरी" क्या हैं। जहां तक राज्य अधिकृत लॉटरी का सवाल है, निश्चित रूप से, संघवाद का सवाल नहीं आएगा, लेकिन जब राज्य ही लॉटरी का आयोजन कर रहा है, तो संघवाद का सवाल उठता है। इसके अलावा सीनियर एडवोकेट रोहतगी ने कहा कि बीआर एंटरप्राइजेज बनाम यूपी राज्य (1999) के फैसले पर भरोसा नहीं किया जा सकता और लॉटरी को सट्टेबाजी या जुआ नहीं माना जा सकता।

अदालत के पहले के फैसले (बीआर एंटरप्राइजेज बनाम यूपी राज्य), जिस पर भरोसा रखा गया है, कहता है कि लॉटरी जुआ है; जुआ वाणिज्यिक है; इसे संदेह की दृष्टि से देखा जाता है और इसलिए अनुच्छेद 301, जिसमें कहा गया है कि इस देश में व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता लागू नहीं होगी। यह सही नहीं है क्योंकि सट्टेबाजी और जुआ अन्यथा सूची II है। इसे सट्टेबाजी और जुए से निकालकर सूची I में रखा गया है। सूची से पता चलता है कि इसे जुआ नहीं माना जाता है और इसलिए पहले के फैसले ने अनुच्छेद 301 के उल्लंघन के सवाल का जवाब नहीं दिया।

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इसको लेकर सीनियर एडवोकेट रोहतगी ने कहा कि वह जो तर्क दे रहे हैं, वह पहले ही अटॉर्नी जनरल द्वारा उठाए जा चुके हैं, जब वह सिक्किम के राज्य वकील थे। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हंसते हुए कहा की वो वकीलों के लिए न्याय का फैसला है। मामले की तात्कालिकता पर प्रकाश डालते हुए याचिकाकर्ताओं ने कहा कि राज्यों के पास कोई धन नहीं है और वे "राजस्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं" और इस प्रकार पीठ से मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया। यह मामला अब अगले सप्ताह के लिए सूचीबद्ध है। कोर्ट ने नागालैंड राज्य द्वारा अपनी लॉटरी पर केरल राज्य द्वारा लगाए गए नियमों को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका पर भी विचार किया था।