विज्ञानियों का प्रयास सफल रहा तो अगले कुछ वर्षों में देश के ज्यादातर हिस्से में बिना किसी लागत शत-प्रतिशत जैविक खेती की कल्पना को साकार किया जा सकेगा। इतना ही नहीं, बिना रासायनिक खाद का इस्तेमाल किए बंजर भूमि को उर्वर बनाया जा सकेगा। यह संभव होगा पुरा सूक्ष्मजीवों (माइक्रोआर्गेनिज्म) की मदद से। राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो (एनबीएआइएम) कुशमौर, मऊ के विज्ञानियों ने पूर्वोत्तर के राज्य सिक्किम की मिट्टी में पाए जाने वाले ऐसे सूक्ष्मजीवों का पता लगाया है। इन सूक्ष्मजीवों की वजह से सिक्किम में शत-प्रतिशत जैविक खेती होती है।

लाखों वर्ष पुराने हैं ये सूक्ष्मजीव 

ब्यूरो के प्रधान विज्ञानी डा. आलोक श्रीवास्तव के मुताबिक ये सूक्ष्मजीव लाखों वर्ष से सिक्किम की मिट्टी में मौजूद हैं। हवा से नाइट्रोजन बनाने के अलावा ये अनेक प्रकार के पोषक तत्व को पैदा करने में सक्षम हैं। इनकी यह विशेषता अभी तक ज्ञात सभी सूक्ष्मजीवों में विशिष्ट है। जीनोम सीक्वेंसिंग के बाद इनका संवर्धन देश के अन्य हिस्सों में भी किया जा सकेगा। ब्यूरो के निदेशक डा. अनिल कुमार सक्सेना के निर्देशन में डा. आलोक श्रीवास्तव व उनके शोध छात्रों ने पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों की मिट्टी के सामुदायिक विश्लेषण (कम्युनिटी एनलिसिस) से इस पुरा सूक्ष्मजीवों को खोज निकाला है। इनके विश्लेषण से पता चला कि ये सूक्ष्मजीवों के ज्ञात इतिहास से भी काफी पुराने यानी लाखों वर्ष पहले के हैं। वहां की मिट्टी में इनकी संख्या कुल सूक्ष्मजीवों की 10 प्रतिशत है। इनकी वजह से सिक्किम की मिट्टी अत्यधिक पोषक और उपजाऊ है।

पहली बार उपजाऊ मिट्टी में मिले

डा. आलोक श्रीवास्तव ने बताया कि इस तरह के सूक्ष्मजीवों की जानकारी एक दशक से ज्यादा पुरानी नहीं है। अभी तक ये समुद्र तल, घने जंगलों या दुर्गम क्षेत्रों में पाए जाते रहे हैं। पहली बार उपजाऊ मिट्टी में इनका पता चला है। प्रयोगशाला में अभी तक इन पुरा सूक्ष्मजीव की कल्चर करने की विधि विकसित नहीं हो सकी है। ब्यूरो इसे विकसित करने के प्रयास में लगा हुआ है। अत्याधुनिक मेटाजीनोमिक तकनीक (सूक्ष्मजीवों के समुदाय के अध्ययन के लिए इस्तेमाल होने वाली तकनीक) से इनका माइक्रोबियल एनलिसिस कर इनकी जीनोम सिक्वेसिंग करने का प्रयास किया जा रहा है।

अन्य सूक्ष्मजीवों से इस तरह हैं भिन्न

सूक्ष्मजीव सामान्यतया वायुमंडल में उपलब्ध हवा से नाइट्रोजन चक्र की दो प्रक्रियाओं नाइट्रीफिकेशन और डि-नाइट्रीफिकेशन को पूरा करते हैं। यानी वायुमंडलीय नाइट्रोजन को अमोनिया और अमोनिया को नाइट्रेट में बदलते रहते हैं। डा. आलोक श्रीवास्तव का कहना है कि पुरा सूक्ष्मजीव नाइट्रीफिकेशन की दर को बढ़ा देते हैं। नाइट्रोजन चक्र के लिए ये सिर्फ हवा पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि मिट्टी में पाई जाने वाली अमोनिया को सीधे नाइट्रेट में बदल देते हैं और पौधे इसे सीधे ग्रहण कर लेते हैं।

यह होगा लाभ

ब्यूरो के विज्ञानियों का कहना है कि इन पुरा सूक्ष्मजीवों की विशेषता सबसे हटकर है। इनकी जीनोम सीक्वेंसिंग के बाद इनका कल्चर बनाने की तकनीक विकसित होते ही इन्हें मैदानी भागों की मिट्टी में विकासित किया जा सकेगा। यदि इसमें सफलता मिली तो इनके माध्यम से आने वाले कुछ वर्षों में देश के अन्य हिस्सों की मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाया जा सकेगा और बिना अतिरिक्त लागत के जैविक खेती की जा सकेगी।