संसार के सर्वोच्च न्यायालय इतिहास है और दस्तावेजों के आधार पर इतिहास आधारित होता है। जब इतिहास के आधार पर भारत स्वतन्त्र हो सकता है तो इतिहास और सत्य तथ्य के आधार पर सिक्किम दार्जिलिंग एकीकरण क्यो नहीं हो सकता। यह सवाल गोरखा राष्ट्रीय कांग्रेस ने किया है। मिरिक प्रेस क्लब में गुरुवार को आयोजित संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए गोरखा राष्ट्रीय कांग्रेस के मुख्य संयोजक सुबोध पाखरीन ने कहा कि सिक्किम दार्जिलिंग विलय का पर्याप्त आधार है।

उन्होने कहा कि वर्ष 1947 में देश आजाद होने के बाद जब देश का संविधान लागू हुआ तब से संविधान के आधार पर ही दार्जिलिंग के भूभाग को पश्चिम बंगाल के दासत्व में अन्तर्भुक्त किया गया। वहीं 1953 के एसआरसी के तहत भाषा के आधार पर दाíजलिंग को प्रशासनिक व्यवस्था के लिए शामिल किया गया था और उसी तरह 1954 के अब्सर्ब्ड लस एरिया को गोरखा राष्ट्रीय कांग्रेस ने रद्द किया है। अब दार्जिलिंग ना तो सिक्किम का रहा, न ही बंगाल का रहा। इसी कारण दार्जिलिंग पहाड़वासियों को समय रहते ही होशियार होने की जरूरत है। एक दिन ऐसा समय भी आएगा कि दार्जिलिंग में स्थानीय रैथाने (मूल निवासी )को बाहर से आकर रह रहे लोग ही बाहर कर सकते हैं। पाखरीन ने कहा कि 1991 के बाद दार्जिलिंग पहाड़ का डेमोग्राफी काफी बदल चुका है। उस समय से अब तक 23.97 फीसद आबादी बढ़ी है। उन्होने कहा कि दार्जिलिंग पहाड़ में जनसंख्या वृद्धि में किसकी संख्या ज्यादा और किसकी कम है यह गम्भीर विषय है। 

गोरखा जाति और दार्जिलिंग को बचाने के किए दार्जिलिंग सिक्किम विलय से बढकर दूसरा विकल्प नहीं है। पाखरीन कहा कि दार्जिलिंग की जनगणना करे , डेलिमिटेशन करे और दार्जिलिंग को वापस करे। तत्कालीन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने साजिश करके दार्जिलिंग में गोरखाओं की 19 प्रतिशत संख्या दिखाकर बंगाल में जबरदस्ती शामिल किया था अब उसी तरह जनगणना करके तथा, डिलिमिटेशन करके दार्जिलिंग को अलग करना होगा ताकि दार्जिलिंग पहाड़ को षड्यन्त्र और अन्याय से मुक्ति मिले। पाखरीन ने आगामी दिनों में होने वाले सम्भावित त्रिपक्षीय वार्ता में पश्चिम बंगाल के दासत्व से मुक्ति के लिए वर्षो से लड़ रहे राजनैतिक दलों, केन्द्र सरकार , सिक्किम और गोरखा राष्ट्रीय कांग्रेस को शामिल करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होने कहा कि , कुछ दिन पहले सिक्किम के एसडीएफ से भाजपा में शामिल हुए 12 विधायकों में से कुछ विधायकों ने जब दिल्लीका रुख किया तो केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने उन विधायकों को सिक्किम दार्जिलिंग विलय करने के सम्बन्ध में चिन्तन मनन कर आने का सुझाव दिया है। इस से स्पष्ट होता है कि यदि सिक्किम मे दार्जिलिंग शामिल होता है तो इस विषय पर पश्चिम बंगाल विरोध कर नहीं सकेगा।

क्योंकि 1986 मे पश्चिम बंगाल सरकार ने श्वेत पत्र जारी कर कहा है कि दार्जिलिंग पश्चिम बंगाल का नहीं बल्कि सिक्किम का भूभाग है। देश की सुरक्षा और अखण्डता के लिए सिक्किम में दार्जिलिंग का शामिल होना नितान्त जरुरी है। वहीं गोरखा राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भरत दोग ने दार्जिलिंग सिक्किम होने से ही दार्जिलिंग का स्थायी राजनैतिक समाधान होने का तर्क दिया है। दोंग का कहना है कि इसको लेकर दार्जिलिंग पहाडृ के शिक्षित युवाओं और सचेत नागरिकों को आगे आना होगा। वहीं गोराकां के महासचिव अमर लक्सम ने कहा कि दार्जिलिंग को उद्धार करना है तो विलय ही एक मात्र विकल्प है। इसके लिए दार्जिलिंग पहाड़ के सभी बुद्धिजीवी , पत्रकारों , सरोकारियों और शिक्षित वर्ग को एक कदम आगे रहकर सोचने तथा सकारात्मक परिणाम के लिए एकजुट होने का आह्वान किया है।