स्वतंत्रता दिवस का दिन हमें याद दिलाता है उन स्वतंत्रता सैनानियों की जिनके बलिदान से हमें आजादी मिली। हालांकि ये आजादी इतनी आसानी से नहीं मिली। इसके लिए हजारों लोगों ने अपने जीवन को बलिदान किया है। हालांकि हम कुछ ही स्वतंत्रता सेनानियों के बारे जानते हैं, क्योंकि कई स्वतंत्रता सेनानी ऐसे भी हैं जो कहीं इतिहास के पन्नों में दफन हो चुके हैं। इसमें भोगेश्वरी देवी फुकन का नाम भी शामिल है।

भोगेश्वरी देवी फुकन एक क्रांतिकारी थी, जिनका जन्म साल 1872 में हुआ था। भोगेश्वरी देवी ने 70 वर्ष की वृद्धा-अवस्था में 1942  के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय असम में नौगांव जिले के बेहरामपुर कस्बे में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व कर अनोखी मिसाल कायम की थी। उन्होंने कस्बे की महिलाओं का संगठन बनाया तथा उन्हें घर की चहारदीवारी से बाहर आकर आन्दोलन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया।

उनके नेतृत्व में विद्रोहियों ने अंग्रेजों द्वारा सील किए गए कांग्रेस कार्यालय की सील तोड़ी और दफ्तर पर कब्जा कर लिया। 13 सितम्बर को विजयादशमी के दिन समारोह में एकत्रित भीड़ पर पुलिस दल ने अचानक आकर लाठियां बरसानी शुरू कर दीं। यह समाचार सुनते ही कस्बे की महिलाओं का नेतृत्व करती हुई भोगेश्वरी देवी तिरंगा हाथ में लेकर अंग्रेज फौज के सामने जा पहुंची। अंग्रेज कप्तान फिंस ने उग्र होती भीड़ को देखकर गोली चलाने का आदेश दे दिया। कुद्ध भोगेश्वरी देवी ने झपटकर झण्डे के डंडे से फिंस पर हमला कर दिया घायल फिंस ने भोगेश्वरी देवी को गोलियों से छलनी कर दिया और वह महान वीरांगना 1942 में वीरगति को प्राप्त हो गई।