आज हम देश की आजादी की 72वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। हालांकि ये आजादी इतनी आसानी से नसीब नहीं हुई। इसके लिए लाखों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी, जिसके बाद अंग्रेज भारत छोड़ने पर मजबूर हुए। ऐसे ही आजादी के एक नायक थे मणिपुर मेजर पाओना ब्रजबासी। 

दरअसल ये आठरहवीं सदी की बात है। जब 1819 में मणिपुर साम्राज्य के पतन की शुरुआत हुई। 1819 में बर्मा साम्राज्य ने मणिपुर पर हमला किया और कब्जा कर लिया। मणिपुर पर बर्मा शासनकाल ने मीतेई के खिलाफ नरसंहार का अभियान देखा, जिसके बाद इस क्षेत्र की आबादी सिर्फ 2500 हो गई। मणिपुर के पतन के बाद, बर्मी साम्राज्य असम और ब्रह्मपुत्र घाटी में फैल गया, लेकिन यहां उन्हें एक अंग्रेजों का सामना करना पड़ा। 1824 में अंग्रेजों ने बर्मा साम्राज्य के खिलाफ जंग का ऐलान किया था। इस बात का फायदा उठाते हुए, मणिपुरी शरणार्थी ने ब्रिटिश के साथ मिलकर बर्मा के खिलाफ जंग लड़ने के लिए तैयार हो गए। शर्त यह थी कि ब्रिटिश मणिपुर के राजकुमार की बर्मा साम्राज्य से रक्षा करेंगे। अंग्रेजों ने सहमति जताई और युद्ध जीता।

1826 तक बर्मा सैनिकों को क्षेत्र से खदेड़ दिया गया था। 1890 में महाराजा चंद्रकीरी की मृत्यु तक सब कुछ शांतिपूर्ण था। इसके बाद सिंहासन के लिए सत्ता संघर्ष ने गृहयुद्ध को उजागर किया। इसके बाद 1891 में ब्रिटिशों ने मणिपुर के खिलाफ युद्ध का ऐलान किया। 24 अप्रैल, 1891 के खोंगजोम युद्ध (अंग्रेज-मणिपुरी युद्ध ) की शुरुआत हुई। ब्रिटिश अधिकारियों और 400 गुरखाओं की एक टुकड़ी राजकुमार को गिरफ्तार करने के लिए इम्फाल पहुंची। उस वक्त राज्य के महाराजा ने राजकुमार को खत्म करने या सौंपने से इंकार कर दिया, तो अंग्रेजों ने अचानक आधी रात को हमला बोल दिया। 

जंग के मैदान में मणिपुरी सेना का मेजर था- पाओना ब्रजबासी, जिसको भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नायक के तौर पर देखा गया। 400 सेनाओं का नेतृत्व कर रही पाओना ब्रजबासी ने बड़ी बहादुरी के साथ ब्रिटिश के खिलाफ जंग के मैदान में टिके रहे। यह जानते हुए कि उनकी सेना अंग्रेजों की विशालकाय सैनिक के सामने ज्यादा देर तक नहीं टिक पाएंगे। जिसमें मणिपुर के वीर सेनानी पाओना ब्रजवासी ने अंग्रेजों के हाथों से अपने मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त हुआ। वह किसी भी कीमत पर अंग्रेजों की गुलामी में जीना नहीं चाहता था। कई इतिहासकारों ने उनकी बाहुदरी के बारे में लिखा हुआ है। इस प्रकार 1891 में मणिपुर ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया।