मणिपुर की एन. बीरेन सिंह सरकार ने राज्य की शराब पॉलिसी में कुछ बदलाव करने का फैसला किया है। मंत्रिमंडल ने राज्य के राजस्व को बढ़ावा देने के साथ-साथ अवैध शराब के सेवन से होने वाले स्वास्थ्य खतरों को कम करने के लिए शराब बनाने, खपत और बिक्री पर प्रतिबंध को आंशिक रूप से हटाने का फैसला किया है। 

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जनजातीय मामलों और पहाड़ी विकास मंत्री लेतपाओ हाओकिप ने मंगलवार को कैबिनेट की बैठक के बाद मीडिया के साथ बातचीत में कहा कि इंफाल शहर, पर्यटन स्थलों, कम से कम 20 बिस्तरों के ठहरने की सुविधा वाले होटलों और सुरक्षाबलों के शिविरों सहित सभी जिला मुख्यालयों से प्रतिबंध हटा लिया जाएगा। मंत्री ने कहा कि शराबबंदी को आंशिक रूप से उठाने से कम से कम 600 करोड़ रुपये का वार्षिक राजस्व मिलेगा। उन्होंने कहा कि हालांकि, अवैध शराब के सेवन से होने वाले स्वास्थ्य खतरों को देखते हुए भी यह फैसला लिया गया है।

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बता दें कि एक बड़े पैमाने पर सार्वजनिक आंदोलन ने राज्य सरकार को मणिपुर शराब निषेध अधिनियम 1991 के माध्यम से शराबबंदी लागू की थी, जिसे बाद में 2002 में संशोधित किया गया। अधिनियम के लागू होने के बाद, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के लोगों को छोड़कर सभी निवासियों के लिए शराब की बिक्री, शराब बनाने और खपत पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, जो परंपरागत रूप से शराब पीते थे। हालांकि, प्रतिबंध के बावजूद शराब की खपत को प्रभावी ढंग से कंट्रोल नहीं किया जा सका और शराब व्यापक रूप से उपलब्ध रही। इस दौरान कई ऐसे मामले में भी सामने आए, जहां अवैध शराब पीने से लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी, जिसे लेकर कई बार राज्य सरकार की आलोचना भी की गई।

राज्य सरकार पारंपरिक रूप से बनाई गई शराब सेकमाई और एंड्रो गांवों से निर्यात करने पर भी विचार कर रही है, जो इसके लिए प्रसिद्ध हैं। मणिपुर सरकार ने हाल ही में निर्यात के लिए वैज्ञानिक शराब बनाने का अध्ययन करने के लिए एक कैबिनेट उप-समिति को गोवा भेजा था।