त्रिपुरा विधानसभा की 59 सीटों के लिए रविवार को हुए मतदान में मात्र 78.56 प्रतिशत वोट पड़े। जो पिछले चुनाव की तुलना में 14 प्रतिशत कम हैं। पिछली बार त्रिपुरा में 91.82 प्रतिशत मतदान हुआ था। विधानसभा की कुल 60 सीटों में से रविवार को 59 पर मतदान हुआ। चारिलाम विधानसभा क्षेत्र में पिछले हफ्ते माकपा उम्मीदवार रामेंद्र नारायण देब वर्मा की मौत हो जाने के कारण रविवार को इस सीट पर मतदान नहीं हो पाया। इस निर्वाचन क्षेत्र में 12 मार्च को वोट डाले जाएंगे। वैसे त्रिपुरा में हुआ मतदान विधानसभा चुनाव के लिए था लेकिन इसका सीधा असर अगले साल के लोकसभा चुनाव पर भी पड़ने वाला है।

 


रविवार को हुए मतदान में राज्य के मुख्यमंत्री माणिक सरकार बूथ पर आए, मतदान किए, हाथ जोड़कर लोगों का अभिवादन किया और बिना कुछ बोले चले गए। माणिक सरकार की इस खामोशी ने त्रिपुरा की सियासी सरगर्मी को और तेज कर दिया है। अब प्रश्न यह उठता है  कि क्या त्रिपुरा में सीपीएम का किला इस बार ढहनेवाला है? क्या इस बार भाजपा 1998 से सत्ता पर काबिज माकपा का हटाने में कामयाब हो जायेगी?

त्रिपुरा दौरे के दौरान पीएम माेदी ने माणिक का उतार फेकने आैर हीरा धारण करने की बात कही थी लेकिन अगर हम इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो साल 1998 से त्रिपुरा के लिए लोगों ने इसी माणिक को अपने सिर माथे पर बिठाकर रखा है। पिछले 20 साल से लगातार 4 बार मुख्यमंत्री का पद संभाल चुके हैं देश के सबसे गरीब मुख्यमंत्री हैं माणिक सरकार का पूरा जीवन बेदाब है। आज तक उन पर किसी तरह का आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है। उनकी सादगी राजनीतिक दुनिया में करिश्माई ताकत दिखाती आयी हैं वे राज्य में बेहद ही लोकप्रिय है।

 

साल 1993 से त्रिपुरा में सीपीएम की सरकार है, जबकि साल 1996 से त्रिपुरा की दोनों लोकसभा सीट पर सीपीएम का ही कब्जा रहा है। आंकड़ों के नजरिए से इस साल के विधानसभा चुनाव और अगले साल होने वाले लोकसभा में सीपीएम का पलड़ा भारी दिख रहा है । लेकिन बड़ी सियासी सच्चाई ये भी है कि पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी ने अबतक के स्थापित कई सियासी समीकरणों को ध्वस्त किया हैं। रविवार को हुए मतदान के नतीजें तीन मार्च का आएंगे। अब देखना ये है कि क्या भाजपा माकपा के किले को गिरा कर अपना झंडा बुलंद कर पाएगी या नहीं।