सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार को एक किसान निकाय से प्रश्न पूछते हुए कहा कि जब उसने तीन कृषि कानूनों ( farmers Law) पर पहले से ही रोक लगा रखी है, तो फिर सड़कों पर प्रदर्शन आखिर क्यों हो रहे हैं? शीर्ष अदालत ने कहा कि जब किसानों ने कृषि कानूनों को अदालत में चुनौती दी है तो फिर विरोध प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं? न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर और सी. टी. रविकुमार ने कहा कि जब एक पक्ष पहले ही कानूनों की वैधता को चुनौती देने के लिए अदालत का रुख कर चुका है तो विरोध प्रदर्शन करने का सवाल ही कहां है।

किसानों के एक निकाय का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील अजय चौधरी ने कहा, या तो आप अदालत में आएं या विरोध करने के लिए सडक़ पर जाएं। वकील ने प्रस्तुत किया कि तीन कानूनों की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई आगे नहीं बढ़ रही है। केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने कहा कि जब मामला विचाराधीन है, तो उस पर कोई विरोध नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा, बड़ी संख्या में याचिकाएं (कृषि कानूनों को चुनौती देने वाली) दायर की गई हैं... लखीमपुर खीरी में एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई।’’ इस पर, पीठ ने जवाब दिया, ‘‘जब ऐसी घटनाएं होती हैं, तो कोई भी जिम्मेदारी नहीं लेता है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रस्तुत किया कि एक बार मामला सर्वोच्च संवैधानिक न्यायालय के समक्ष है, तो फिर कोई भी उस मुद्दे पर सडक़ों पर नहीं हो सकता है। पीठ ने कहा कि जब सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान होता है और जानमाल का नुकसान होता है तो कोई भी जिम्मेदारी नहीं लेता है।पीठ ने कहा, अदालत ने इसे स्थगित रखा है। कानून संसद ने पारित किया था, सरकार ने नहीं। एजी ने कहा: कोई और दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं होनी चाहिए। पीठ ने कहा कि अदालत के अलावा कोई भी कृषि कानूनों की वैधता का फैसला नहीं कर सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा, जब ऐसा है और जब किसान अदालत में कानूनों को चुनौती दे रहे हैं, तो फिर सडक़ पर विरोध क्यों किया जा रहा है?

पीठ ने कहा कि वह मुख्य मुद्दे की जांच करेगी कि क्या विरोध का अधिकार पूर्ण अधिकार है? इसमें कहा गया है कि जब याचिकाकर्ता के पास पहले से ही एक रिट याचिका है, तो क्या मामला विचाराधीन होने पर भी उसे विरोध करने की अनुमति दी जा सकती है। जैसे ही वकील ने कहा कि कानूनों के खिलाफ राजस्थान उच्च न्यायालय के समक्ष एक याचिका पहले ही दायर की जा चुकी है, पीठ ने पूछा, ‘‘यह अभी भी पेचीदा है, फिलहाल कोई अधिनियम नहीं है .. अदालत ने अधिनियम पर रोक लगा दी है.. फिर आखिर विरोध किसलिए हो रहा है?’’ चौधरी ने कहा कि ऐसे मामलों में बहस, संवाद और विरोध एक साथ चल सकते हैं। पीठ ने कहा कि वह राजस्थान उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित मामले को स्थानांतरित कर देगी और विरोध की वैधता पर फैसला करेगी और मामले की अगली सुनवाई 21 अक्टूबर को निर्धारित करने की बात कही। 

शीर्ष अदालत किसान महापंचायत द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें तीन कृषि कानूनों के खिलाफ राजधानी के जंतर मंतर पर ‘सत्याग्रह’ करने की अनुमति देने के लिए अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई थी। किसान महापंचायत, किसान और कृषक निकाय तथा उसके अध्यक्ष ने जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण और अहिंसक ‘सत्याग्रह’ आयोजित करने के लिए कम से कम 200 किसानों या प्रदर्शनकारियों के लिए जगह उपलब्ध कराने के लिए अधिकारियों को निर्देश देने की भी मांग की है।